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भारत का सबसे बड़ा गैंबलर, लोग कहते हैं मटका किंग, बुरे धंधे में 'रतन' की ईमानदारी थी सबसे बड़ी पहचान!

Published: Tue, 12 May 2026 01:32 PM (IST)

मुंबई के 'मटका किंग' रतन खत्री ने गली-मोहल्ले से भारत का सबसे बड़ा जुआ कारोबार खड़ा किया। कहा जाता है ...और पढ़ें

रतन खत्री को मुंबई का मटका किंग कहा जाता था।

रतन खत्री को मुंबई का मटका किंग कहा जाता था।

HighLights

  1. रतन खत्री ने भारत में सबसे बड़ा जुआ कारोबार खड़ा किया।

  2. उन्हें मुंबई का असली 'मटका किंग' कहा जाता था।

  3. 9 मई 2020 को मुंबई में रतन खत्री का निधन हो गया।

नई दिल्ली। भारत के सबसे अरबपति कारोबारी, सबसे अमीर अभिनेता और सबसे दौलतमंद खिलाड़ी के बारे में आपने काफी सुना होगा। लेकिन, क्या आप देश के सबसे बड़े जुआरी के बारे में जानते हैं, जिसे मटका किंग, सट्टा सम्राट तक कहा जाता है। मुंबई के रहने वाले रतन खत्री (Ratan Khatri) ने गली-मोहल्ले के सट्टेबाजी के धंधे से भारत का सबसे बड़ा जुआ कारोबार खड़ा कर लिया था।

मुंबई के असली 'मटका किंग' (Matka King) कहे जाने वाले रतन खत्री ने 1960 के दशक में बॉम्बे में जुए का कारोबार शुरू किया और इस सट्टेबाजी सिस्टम पूरे देश में बड़ी पहचान दिला दी। आइये आपको बताते हैं इस मटका किंग से मशहूर रतन खत्री की कहानी

कौन थे रतन खत्री?

भारत के सबसे बड़ा जुआरी और मटका किंग रतन खत्री को माना जाता है। इस शख्स ने भारत में सबसे शक्तिशाली अंडरग्राउंड सट्टेबाजी नेटवर्क में से एक का निर्माण किया। कराची के सिंधी हिंदू परिवार में जन्मे खत्री, 1947 के विभाजन के बाद अपने परिवार के साथ मुंबई चले आए। विभाजन का दुख झेलने वाले लाखों शरणार्थियों की तरह, जिन्होंने अपना जीवन फिर से संवारा, शहर के कपड़ा और व्यापारिक क्षेत्र में काम करना शुरू किया। लेकिन, रतन खत्री की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। यहीं पर उनका सामना पहली बार मटका सट्टेबाजी से हुआ।

कैसे मिला 'मटका' जुए का आइडिया

रतन खत्री के उभरने से पहले बॉम्बे के बाजारों में सट्टेबाजी मुख्य रूप से न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज और बॉम्बे कॉटन एक्सचेंज के बीच कपास के खुलने और बंद होने के भाव पर लगाया जाता था। 1961 में जब न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज ने टेलीप्रिंटर के जरिए ये भाव भेजने बंद कर दिए, तो यहीं से 'मटका' का जन्म हुआ, जिसमें एक बड़े बर्तन (मटके) में पर्चियां डालकर नंबर निकाले जाने लगे। रतन खत्री ने इस काम में बड़ा अवसर देखा। इसके बाद रतन खत्री ने कल्याणजी भगत (जिन्होंने 'वर्ली मटका' शुरू किया था) के साथ काम किया। लेकिन 1964 में खत्री ने अपना खुद का 'रतन मटका' शुरू कर दिया।

ईमानदारी से सट्टेबाजी का काम!

जुआ और सट्टा, बुरा खेल और इसमें बेईमानी होती है लेकिन अपने समय के कई जुआ संचालकों के विपरीत, रतन खत्री ने इस बुरे धंधे में ईमानदार छवि बनाई। जब मटके से पर्ची निकालने के तरीके पर लोगों को शक होने लगा कि इसमें हेराफेरी हो सकती है, तो खत्री ने ताश के पत्तों का इस्तेमाल शुरू किया। कहा जाता है कि सट्टेबाजों और आम लोगों को खत्री की ईमानदारी पर इतना भरोसा था कि उनका मटका नेटवर्क पूरे देश में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हो गया।

साल 1975 में जब देश में आपातकाल तो रतन खत्री को गिरफ्तार कर लिया गया। 19 महीने जेल में रहने के बाद जब रतन खत्री रिहा हुए तो उनका सट्टा कारोबार धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा। 9 मई 2020 को मुंबई में रतन खत्री का निधन हो गया।

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1970 और 80 के दशक में रतन खत्री के 'मटका' नेटवर्क में रोज़ाना लगभग 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक का दांव लगता था। उनके सिंडिकेट में लाखों पंटर्स (दांव लगाने वाले) और हजारों बुकी शामिल थे और सट्टे का नंबर देश भर में टेलीफोन और टेलीग्राम के जरिए भेजे जाते थे।

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