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    Edible Oil Price: सरकार ने घटाया खाद्य तेलों पर आयात शुल्क, कीमतों पर जल्द दिखने लगेगा असर

    Updated: Sat, 31 May 2025 07:47 PM (IST)

    खाद्य तेलों में आई महंगाई को काबू में करने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने क्रूड पाम ऑयल सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (Edible Oil Price Cut) को 20% से घटाकर 10% कर दिया है। इन तेलों पर कुल प्रभावी आयात शुल्क अब 16.5% हो गया है जो पहले 27.5% था।

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    केंद्र ने क्रूड खाद्य तेलों पर आयात शुल्क को घटाकर आधा कर दिया है।

    नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने खाद्य तेलों में आई महंगाई से राहत देने के लिए एक अहम कदम उठाया है। केंद्र ने क्रूड खाद्य तेलों पर आयात शुल्क को घटाकर आधा (Edible Oil Price Cut) कर दिया है। इससे पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल जैसे खाने के तेलों की कीमतों में कमी आने की उम्मीद है।

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    सरकार ने क्रूड पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (Edible Oil Custom Duty) को 20% से घटाकर 10% कर दिया है। इसके अलावा, कृषि अवसंरचना सेस (AIDC) और सोशल वेलफेयर सरचार्ज को मिलाकर कुल प्रभावी आयात शुल्क अब 16.5% हो गया है, जो पहले 27.5% था।

    सरकार ने क्यों किया यह फैसला?

    देश में बीते कुछ महीनों में खाद्य तेलों की कीमतों में तेज उछाल दर्ज की गई है। महंगाई के आंकड़ों के मुताबिक, खाद्य तेलों की महंगाई साल-दर-साल 17.4% बढ़ी है। मई में सरसों के तेल की कीमतें 25% बढ़कर 170 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई हैं, जबकि पाम ऑयल 34% महंगा हो गया है। सनफ्लावर ऑयल 30% और सोयाबीन ऑयल 18% महंगा हुआ है।

    खाद्य तेलों में महंगाई की वजह क्या है?

    खाद्य तेलों की महंगाई के पीछे अलग-अलग वैश्विक कारक हैं। जैसे कि रूस और यूक्रेन में जारी संघर्ष के चलते सनफ्लावर ऑयल की सप्लाई लगातार प्रभावित रही है। मौसम की मार से ब्राजील और अर्जेंटीना में सोयाबीन की फसल को नुकसान पहुंचा है, जबकि पाम तेल के सबसे बड़े उत्पादक देशों इंडोनेशिया और मलेशिया ने इसके निर्यात पर कई तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है, आयात शुल्क में कमी करने से खुदरा बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में कमी आएगी और उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला उपभोक्ताओं और रिफाइनिंग उद्योग दोनों के लिए फायदेमंद है।