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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 12, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

भारतीय क्रिकेट प्रेमियों की तरह भावुक हो जाते हैं आर्थिक विशेषज्ञ

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Published: Thu, 12 Sep 2013 02:16 PM (IST)Updated: Mon, 30 Mar 2015 06:40 PM (IST)

आर्थिक विशेषज्ञ हमारे भारतीय किक्रेट प्रेमियों से कुछ कम नहीं हैं। जैसे कोई किक्रेट प्रेमी अपनी पसंदीदा टीम को पागलपन ...और पढ़ें

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नई दिल्ली। आर्थिक विशेषज्ञ हमारे भारतीय किक्रेट प्रेमियों से कुछ कम नहीं हैं। जैसे कोई किक्रेट प्रेमी अपनी पसंदीदा टीम को पागलपन की हद तक चाहने लगता है। जब टीम अच्छा प्रदर्शन करती है तो वह अपने खिलाड़ियों को भगवान का दर्जा तक दे देता है। ऐसे में वह टीम भी खामियों को भी नजरअंदाज कर देता है। लेकिन जब वह हारती है, जोकि स्वाभाविक है, तो वह उसकी सारी कमजोरियों का बखान करने लगता है। वास्तविकता यह है कि टीम जब जीतती है तो भी इतनी अच्छी भी नहीं होती जितना फैंस उसे बना देते हैं और हारने पर उतनी खराब भी नहीं होती है जितना की बताया जाता है। टीम की जीत उसकी कमजोरियों को छुपा देती है।

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ऐसा ही कुछ व्यवहार भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ भी हो रहा है जिसमें विदेशी कमेंटेटर यानी आर्थिक विशेषज्ञों ने भी भारतीयों का साथ दिया। वह अति उत्साहित और आत्म समालोचना वाले बन गए। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने एक जगह लिखा कि भारत के आर्थिक प्रदर्शन की तुलना पड़ोसी देशों से की जाती थी। कुछ साल पहले तक भारत कुछ भी गलत नहीं सकता था, लेकिन आज भारत में कुछ भी गलत हो सकता है।

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चालू खाता घाटे और अर्थव्यवस्था की धीमी गति पर रघुराम ने लिखा कि क्या मामूली सुधारों से सब ठीक हो सकता है। उन्होंने लिखा कि यह कहना सही नहीं होगा कि महत्वाकांक्षी सुधार अच्छे नहीं है, लेकिन वर्तमान परेशानियों को ठीक करने के लिए भारत को मैन्युफैक्चरिंग का हब बनने की जरूरत भी नहीं है। उन्होंने कहा कि आर्थिक मंदी की विडंबना है कि अर्थव्यवस्था में गिरावट आई है। साल 2008 में आई आर्थिक मंदी के बाद नीति निर्माताओं द्वारा अर्थव्यवस्था में पर्याप्त राजकोषीय प्रभाव भी देखा गया है। इसके परिणामस्वरूप महंगाई में इजाफा हुआ। वैसे भी दुनिया दोबारा महामंदी की चपेट में नहीं जाना चाहती। उन्होंने कहा कि इसलिये कुछ मौद्रिक नीतियां सख्त रहेंगी, जैसे ऊंची ब्याज दर।