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ये शहर है भारत की 'पटाखा कैपिटल': यहीं बनते हैं देश के 90% क्रैकर्स; 1920 के दशक में इन्होंने रखी थी नींव

Published: Sun, 08 Nov 2026 10:53 AM (IST)Updated: Sun, 08 Nov 2026 11:50 AM (IST)

Diwali 2026: देश के लगभग 8,000 छोटे-बड़े कारखाने शिवकाशी और इसके आसपास के क्षेत्रों में स्थित हैं। शिवकाशी में पटाखों ...और पढ़ें

दीवाली के दौरान पटाखों का कितना कारोबार होता है? (AI फोटो)

दीवाली के दौरान पटाखों का कितना कारोबार होता है? (AI फोटो)

HighLights

  1. देश भर में खूब पटाखे फोड़े जाते हैं

  2. भारत की 'पटाखा राजधानी' है शिवकाशी

  3. 8,000 छोटे-बड़े कारखाने है यहां

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। आज दीवाली (Diwali 2026) है और इस मौके पर देश भर में खूब पटाखे फोड़े जाते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि भारत के किस शहर में सबसे अधिक पटाखे बनते हैं? अगर नहीं, तो हम यहां आपको इसी शहर की जानकारी देंगे, जिसे भारत की 'पटाखों की राजधानी' कहा जाता है।

तमिलनाडु का शिवकाशी

तमिलनाडु के शिवकाशी (Sivakasi) को भारत की 'पटाखा राजधानी' (Fireworks Capital of India) कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि देश में बनने वाले कुल पटाखों का लगभग 90% हिस्सा अकेले इसी शहर में उत्पादित होता है।
भारत में बनने वाले कुल पटाखों का लगभग 85% से 90% हिस्सा अकेले शिवकाशी में उत्पादित होता है। यहाँ दिवाली के दौरान हजारों करोड़ रुपये का कारोबार होता है और लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। एक अनुमान के अनुसार इस शहर में 8 लाख लोगों को इसी उद्योग से रोजगार मिला हुआ है।

8,000 छोटे-बड़े कारखाने

देश के लगभग 8,000 छोटे-बड़े कारखाने शिवकाशी और इसके आसपास के क्षेत्रों में स्थित हैं। शिवकाशी में पटाखों के लिए कच्चा माल, बारूद और केमिकल सप्लायर, पैकेजिंग बॉक्स बनाने वाली कंपनियां और 500 से अधिक प्रिंटिंग प्रेस सब कुछ एक ही स्थान पर मौजूद हैं। इससे उत्पादन लागत काफी कम रहती है।

दीवाली के दौरान कितना कारोबार होता है?

शिवकाशी में सालाना लगभग ₹7,000 करोड़ का पटाखा कारोबार होता है। वहीं अकेले दिवाली के दौरान लगभग ₹4,000 करोड़ की बिक्री होती है। गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसकी उच्च औद्योगिक कार्यक्षमता को देखते हुए शिवकाशी को 'कुट्टी जापान' (Mini Japan) की उपाधि दी थी।

कैसे हुई थी शुरुआत?

1920 के दशक में पी. अय्या नाडार और शन्मुगा नाडार जैसे उद्यमियों ने यहाँ माचिस और आतिशबाजी के काम की नींव रखी थी। द्वितीय विश्व युद्ध (1938-1944) के दौरान जब विदेशों से पटाखों का आयात बंद हो गया, तो स्थानीय उद्योग को बहुत तेजी से बढ़ने का मौका मिला।

जलवायु भी सहयोगी

पटाखों के अलावा शिवकाशी देश का बहुत बड़ा माचिस निर्माण और प्रिंटिंग प्रेस का भी केंद्र है (जहाँ पटाखों और अन्य उत्पादों के लिए पैकेजिंग व लेबल छपते हैं)। यहाँ की जलवायु शुष्क (dry climate) होने से बारूद और पटाखे सुखाना आसान होता है, लेकिन सुरक्षा मानकों की कमी, प्रदूषण के कड़े नियम और ग्रीन पटाखों (Green Crackers) की अनिवार्यता जैसी बड़ी चुनौतियाँ इस उद्योग के सामने रहती हैं।

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