बोरोलिन की अनसुनी कहानी, जिसने विदेशी कंपनियों के 'मरहम' की कर दी थी छुट्टी; 15 अगस्त 1947 को 1 लाख बंटी थी फ्री
बोरोलिन क्रीम, जो भारतीय घरों का एक अभिन्न अंग है, की शुरुआत आजादी से 18 साल पहले स्वदेशी आंदोलन के ...और पढ़ें

बोरोलिन क्रीम का इतिहास बेहद पुराना (AI फोटो)
HighLights
बोरोलिन की शुरुआत 1929 में स्वदेशी आंदोलन के दौरान हुई
गौर मोहन दत्ता ने विदेशी निर्भरता कम करने को इसे बनाया
आजादी के दिन एक लाख ट्यूब मुफ्त बांटी गईं थीं
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। भारत में कुछ चीजें सिर्फ उत्पाद नहीं होतीं, बल्कि यादों, भरोसे और पीढ़ियों के रिश्तों का हिस्सा बन जाती हैं। बोरोलिन (Boroline History) ऐसी ही एक क्रीम है। घर में होंठ फट जाएं, त्वचा रूखी हो जाए या छोटी-मोटी खरोंच लग जाए, तो अक्सर दादी-नानी की अलमारी से निकलने वाली हरे रंग की ट्यूब याद आ जाती है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस क्रीम की शुरुआत आजादी मिलने से करीब 18 साल पहले हुई थी? बोरोलिन का जन्म केवल कारोबार करने के लिए नहीं, बल्कि विदेशी उत्पादों पर भारत की निर्भरता कम करने और स्वदेशी को बढ़ावा देने के विचार से हुआ था। लगभग एक सदी का सफर तय कर चुकी यह क्रीम आज भी भारतीय उपभोक्ताओं के बीच अपनी अलग पहचान रखती है।
ब्रिटिश शासन में स्वदेशी आंदोलन का दौर
बोरोलिन की कहानी 1920 के दशक के उस दौर से शुरू होती है, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और स्वदेशी आंदोलन देश में आत्मनिर्भरता की भावना मजबूत कर रहा था। उस समय बाजार में विदेशी, खासकर ब्रिटेन से आने वाले औषधीय उत्पादों की मौजूदगी थी।
ऐसे माहौल में कोलकाता के कारोबारी गौर मोहन दत्ता ने सोचा कि भारतीयों को अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पाद अपने ही देश में क्यों नहीं मिल सकते? उनका मानना था कि देश की आर्थिक आजादी के लिए जरूरी है कि भारत अपनी जरूरत की चीजें खुद बनाए। इसी सोच ने एक ऐसी क्रीम की नींव रखी, जो आगे चलकर भारतीय घरों का जाना-पहचाना नाम बन गई।
गौर मोहन दत्ता कौन थे?
गौर मोहन दत्ता का संबंध बंगाल के एक व्यापारी परिवार से था। वह कोलकाता के बड़ाबाजार इलाके में कारोबार करते थे और उनकी फर्म जी. दत्ता एंड कंपनी विदेशी सामान, विशेषकर दवाइयों के आयात से जुड़ी थी। विदेशी उत्पादों के कारोबार के दौरान उन्होंने बाजार में पेट्रोलियम जेली और बोरिक एसिड से जुड़े एक मरहम को देखा।
इससे उन्हें भारतीय परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार अपना उत्पाद तैयार करने का आइडिया आया। उनका लक्ष्य विदेशी क्रीम की नकल करना भर नहीं था, बल्कि अच्छी क्वालिटी वाला ऐसा स्वदेशी विकल्प बनाना था, जो अपेक्षाकृत सस्ती कीमत पर लोगों तक पहुंच सके। यही कारोबारी अनुभव आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बना।
कैसे बनी बोरोलिन?
गौर मोहन दत्ता ने अपने विचार को हकीकत में बदलने के लिए प्रयोग शुरू किए। बोरोलिन की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, उन्होंने 1928 में प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रे से मार्गदर्शन लिया। इसके बाद उन्होंने अपनी क्रीम के फॉर्मूले को बेहतर बनाने पर काम किया। आखिरकार 1929 में बोरोलिन का निर्माण शुरू हुआ।
शुरुआती दिनों में इसे दत्ता ने अपने घर पर बनाया और उनकी पत्नी कमला बाला ने भी इस काम में सहयोग दिया। क्रीम का नाम 'बोरोलिन' रखा गया, जो बोरिक एसिड से जुड़े 'बोरो' और तेल के लिए इस्तेमाल होने वाले लैटिन शब्द 'ओलियम' से प्रेरित माना जाता है। 1930 में इस उत्पाद के लिए पेटेंट भी दर्ज कराया गया। इस तरह एक घरेलू प्रयोग ने औद्योगिक और व्यावसायिक पहचान हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
हरी ट्यूब, हाथी का लोगो और खास पहचान
बोरोलिन की लोकप्रियता में उसके उत्पाद के साथ-साथ उसकी पैकेजिंग की भी अहम भूमिका रही। हरे रंग की ट्यूब और उस पर बना सफेद हाथी धीरे-धीरे इसकी पहचान बन गए। बंगाल में इसे आम बोलचाल में 'हातिवाला क्रीम' यानी हाथी वाली क्रीम भी कहा जाने लगा। इसकी सादगी और आसानी से पहचाने जाने वाली पैकेजिंग ने इसे अलग पहचान दी।
कंपनी ने समय के साथ अपनी ब्रांड पहचान को बनाए रखा और बोरोलिन को केवल त्वचा की देखभाल से जुड़े उत्पाद के रूप में नहीं, बल्कि घर में रखी जाने वाली जरूरी चीज के रूप में स्थापित किया। खासकर बंगाली परिवारों में इसका सांस्कृतिक महत्व बढ़ा और यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही।
आजादी के जश्न से जुड़ा दिलचस्प किस्सा
बोरोलिन के इतिहास का सबसे दिलचस्प किस्सा 15 अगस्त 1947 से जुड़ा है। कंपनी के अनुसार, भारत की आजादी के दिन एक लाख बोरोलिन ट्यूब मुफ्त बांटने की घोषणा की गई थी। यह कदम स्वदेशी उत्पाद के प्रति गर्व और देश की स्वतंत्रता का जश्न मनाने का प्रतीक था।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पैकेजिंग सामग्री की कमी के कारण कंपनी को उपलब्ध डिब्बों और कंटेनरों का इस्तेमाल भी करना पड़ा। उस समय पैक पर यह स्पष्ट किया जाता था कि पैकेजिंग बदली गई है, लेकिन उत्पाद की मात्रा और गुणवत्ता में बदलाव नहीं हुआ है।
आज कितना बड़ा है बोरोलिन का कारोबार?
आज बोरोलिन की ओनरशिप कोलकाता स्थित जी. डी. फार्मास्यूटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड के पास है। कंपनी ने समय के साथ अन्य उत्पाद भी पेश किए हैं, लेकिन बोरोलिन उसकी सबसे चर्चित ब्रांड पहचान बनी हुई है। समय के साथ कंपनी के कारोबार का दायरा बढ़ा। आज भी बोरोलिन की असली ताकत उसका दशकों से कायम उपभोक्ता भरोसा, पहचानने योग्य पैकेजिंग और पीढ़ियों से जुड़ी भावनात्मक विरासत है।
