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    सांडर्स की हत्या के लिए केदार मणि शुक्ल ने भगत सिंह को पहुंचाया था हथियार

    By JagranEdited By:
    Updated: Tue, 09 Aug 2022 11:36 PM (IST)

    बेतिया। चंपारण की माटी स्वतंत्रता आंदोलन में अपने वीर सपूतों को याद कर बेहद गौरवान्वित हो रही है। कई वीर सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत को पानी पिला कर रखा दिया था।

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    सांडर्स की हत्या के लिए केदार मणि शुक्ल ने भगत सिंह को पहुंचाया था हथियार

    बेतिया। चंपारण की माटी स्वतंत्रता आंदोलन में अपने वीर सपूतों को याद कर बेहद गौरवान्वित हो रही है। कई वीर सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत को पानी पिला कर रखा दिया था। इसी कड़ी में केदार मणि शुक्ल का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है। आंदोलन में क्रांतिकारियों के बीच एक सच्चे सिपाही के रूप में उनकी पहचान थी। 1907 में जन्मे भितहां गांव निवासी भरत शुक्ल के पुत्र केदार मणि शुक्ल को मौलनिया डकैती कांड के आरोप में दस वर्ष कैद की सजा हुई। अंग्रेजों ने उन्हें काला पानी की सजा दी और वे अंडमान जेल भेजे गए। आंदोलन के दौरान उन्होंने बेतिया में चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह को आश्रय दिया था। मौलनिया डकैती के बाद फरार हुए शुक्ला को अंग्रेजों ने उत्तर प्रदेश में गिरफ्तार किया। मोतिहारी जज की अदालत में पांच अक्टूबर 1931 को उन्हें सजा सुनाई गई थी। जेल में ही उन्होंने 1933 और 37 में भूख हड़ताल किया। आंदोलन के दौरान उन्हें कुल चौदह वर्ष जेल में काटनी पड़ी। जब महात्मा गांधी चंपारण में आए और सत्याग्रह आंदोलन की शुरूआत की तो उनकी उम्र दस वर्ष थी। उसके सात साल बाद वे बेतिया राज स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। उनके शिक्षक मामा के माध्यम से 1924 में फणींद्रनाथ घोष से मुलाकात हुई। जब घोष से उन्होने अंग्रेजों को भगाने के लिए चंद सवाल किए तो उनका जवाब सुनकर घोष ने केदार मणि शुक्ल का पीठ थपथपाया और तभी से उनकी घनिष्ठता हुई। इसके बाद अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलन में इनका प्रवेश हो गया। आनंद मठ, एक समाज सेवक और बंदी जीवन जैसी पुस्तकों को पढ़ने के लिए फणींद्रनाथ घोष ने ही उन्हें प्रोत्साहित किया था और इसके बाद तो उनके मन मस्तिष्क में सिर्फ और सिर्फ जुल्म के पर्याय अंग्रेजों को भगाने की सोच बन गई। आरंभ में उन्होने सिर्फ कुरियर का काम किया। पत्र वाहक और सामान पहुंचाने के काम में लग गए। केदार मणि शुक्ला ने अपने एक साक्षात्कार में उल्लेख किया है कि 1925-26 तक उन्हें नहीं मालूम रहता था कि कौन सा सामान किस क्रांतिकारी को देना है। उन्हें जगह बताकर एक चिन्ह दे दिया जाता था। केदार मणि शुक्ल ने ही भगत सिंह तक वह पिस्तौल पहुंचाई थी, जिससे सांडर्स मारा गया था। वह पिस्तौल संगठन में सक्रिय एक क्रांतिकारी ने ही उन्हें दी थी। सहारनपुर स्टेशन पर भेजा गया था और जिस भगत सिंह को देना था उनका सिर्फ हुलिया बताया गया था। भगत सिंह को तब पहचान पाए जब वे सांडर्स की हत्या के बाद बिहार पहुंचे थे। स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों के साथ उन्होंने कई डकैतियों में हिस्सा लिया। बैठकें और क्रांति के लिए साधन जुटाने में गरौल डकैती, वजीरपुर डकैती और मौलनिया डकैती में मुख्य रूप से शामिल रहे। उन्होंने मजदूर एवं किसान आंदोलन में भी भाग लिया। हिदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की बिहार यूनिट के मुख्य नेता रहे। इधर स्व. केदार मणि शुक्ल के पुत्र अवकाश प्राप्त एचएम मदन मणि शुक्ल की माने, तो उनके पिता महान स्वतंत्रता सेनानी स्वतंत्रता संग्राम में कैरियर की भूमिका निभाते रहे और इससे तत्कालीन राष्ट्र के प्रमुख आंदोलनकारियों से उनका गहरा संबंध स्थापित हुआ।

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