बिहार में पिता धोते थे दूसरों के कपड़े, बेटी ने फुटबॉल खेलकर बदली तकदीर; 23 साल की उम्र में पाई सरकारी नौकरी
नरकटियागंज की निशा कुमारी ने अपनी मेहनत और प्रतिभा से फुटबॉल में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। उन्होंने 'मेडल लाओ, ...और पढ़ें

माता पिता के साथ निशा कुमारी। फोटो जागरण
HighLights
निशा कुमारी ने 12 साल की उम्र से फुटबॉल खेलना शुरू किया।
राष्ट्रीय स्तर पर खेलकर 'मेडल लाओ, नौकरी पाओ' से सरकारी नौकरी पाई।
वर्तमान में पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में लिपिक पद पर कार्यरत हैं।
जागरण संवाददाता, नरकटियागंज। बेटियां अगर ठान लें तो संघर्ष की राह पर चलते हुए सफलता की नई इबारत लिख सकती हैं। इसका जीवंत उदाहरण हरदिया चौक निवासी 23 वर्षीय निशा कुमारी हैं।
गरीब परिवार में जन्मी निशा ने फुटबॉल के मैदान में अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर न सिर्फ जिले और राज्य का नाम रोशन किया, बल्कि सरकारी नौकरी हासिल कर परिवार की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर उठा ली है।
निशा के पिता बृजेश बैठा कपड़े धोने और इस्त्री करने का काम करते हैं, जबकि मां सुनीता देवी गृहिणी हैं। चार बहनों और दो भाइयों वाले परिवार में पली-बढ़ी निशा के लिए सफलता का यह सफर आसान नहीं था।
12 साल की उम्र से शुरू किया सफर
करीब 12 वर्ष की उम्र में वर्ष 2015 में उन्होंने फुटबॉल खेलना शुरू किया। निशा बताती हैं कि उनकी कुछ सहेलियां फुटबॉल खेलती थीं। स्कूल जाने के बाद वे अभ्यास के लिए मैदान में जाती थीं।
उन्हें खेलते देखकर निशा के मन में भी फुटबॉल खेलने की इच्छा जगी। सहेलियों ने प्रशिक्षक सुनील वर्मा से संपर्क कराया और यहीं से उसके सपनों को नई उड़ान मिली। प्रशिक्षक के सानिध्य में लगातार अभ्यास और मेहनत के दम पर निशा जिला से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचीं।
ओडिशा में आयोजित राष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन ने उनकी किस्मत बदल दी। बिहार सरकार की 'मेडल लाओ, नौकरी पाओ' योजना के तहत पिछले वर्ष उन्हें सरकारी नौकरी मिली।
वर्तमान में वह पूर्वी चंपारण के मोतिहारी अनुमंडल में लिपिक के पद पर कार्यरत हैं। निशा कहती हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन सरकारी सेवक बनेंगी।
मेहनत और खेल के प्रति जुनून ने उनका सपना पूरा कर दिया। अब माता-पिता सहित पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभाना ही उनका अगला लक्ष्य है।
टिप्पणियों को नजरअंदाज कर लक्ष्य की ओर बढ़ती रही निशा
फुटबॉल के मैदान में निशा का आत्मविश्वास और जज्बा उसकी पहचान है। वह फुटबॉल में राइट आउट पोजिशन पर खेलने में माहिर है। निशा बताती है कि जब वह हाफ पैंट पहनकर खेलने के लिए घर से निकलती थी, तब कुछ लोग लड़की होकर हाफ पैंट पहनने पर तंज कसते थे, लेकिन उसने कभी ऐसी टिप्पणियों की परवाह नहीं की।
उसके माता-पिता भी उसके लक्ष्य के प्रति हमेशा अडिग रहे और पूरा साथ दिया। निशा का मानना है कि हर माता-पिता को बेटियों को अपनी पसंद का क्षेत्र चुनने की आजादी देनी चाहिए। मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।
समाज की नजरिया बदल रही है। बेटियों को भी पढ़ने दिखने से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में लोग आगे बढ़ा रहे हैं। गरीब परिवार की निशा का संघर्ष उसे मुकाम दिलाया है। ऐसे ही सभी बेटियों को आगे बढ़ना चाहिए। -रेणु देवी
समाज संकीर्णता से बाहर निकल रहा है। बेटे और बेटियों में फर्क खत्म हो रहा है। ऐसा सुखद माहौल बन रहा है। बेटियों को घर से बाहर निकल कर लक्ष्य साधने का अवसर सफलता में बदल रहा है। खिलाड़ी निशा की तरह सभी बेटियों को प्रयास करनी चाहिए। -मनीषा कुमारी
जिस परिवार में बेटियां नहीं होतीं, वहां अधूरा सा महसूस किया जाता है। बेटियां शिक्षा, खेल और रोजगार सहित हर क्षेत्र में अच्छा काम कर रही हैं। ऐसा अवसर हर जगह हर समाज में मिलनी चाहिए। निश्चित तौर पर परिवार और समाज का चौतरफा विकास होगा। जैसा कि खिलाड़ी निशा परिवार की दशा बदल रही हैं। -मीनू श्रीवास्तव
लड़कियों की शिक्षा से लेकर रोजगार के अवसर तक सरकार की प्राथमिकता में है। बेटियों को इसका लाभ लेना चाहिए। परिश्रम करने में बेटियां पीछे नहीं हैं। विभिन्न क्षेत्रों में कामयाबी हासिल कर रही हैं। घर परिवार संभाल रही हैं। महिला सशक्तिकरण हो रहा है। -डॉ प्रीति कुमारी
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