कोरोना काल में नौकरी गई तो पत्नी ने दिखाई राह, बिहार के प्रवीण ने खड़ा किया लाखों का कारोबार
कोरोना काल में लुधियाना की नौकरी छूटने के बाद औरंगाबाद के प्रवीण कुमार सिंह ने अपनी पत्नी नगिया देवी के सहयोग से गांव में सिलाई का काम शुरू किया। ।

प्रवीण कुमार सिंह ने अपनी पत्नी नगिया देवी के साथ। फोटो जागरण
HighLights
कोरोना में नौकरी छूटने पर प्रवीण ने शुरू किया सिलाई व्यवसाय।
पत्नी नगिया देवी ने जीविका से ऋण लेकर की आर्थिक मदद।
तीन मशीनों से शुरू कारोबार अब 15 लोगों को दे रहा रोजगार।
शुभम कुमार सिंह, औरंगाबाद। कोरोना संक्रमण का दौर खत्म हो गया, लेकिन इसने कई परिवारों की जिंदगी की दिशा बदल दी।
हसपुरा प्रखंड के धुसरी गांव निवासी प्रवीण कुमार सिंह की लुधियाना की कपड़ा फैक्ट्री की नौकरी कोरोना काल में चली गई। रोजगार छूटा तो परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया।
गांव लौटने के बाद काफी दिनों तक काम की तलाश में भटकते रहे, लेकिन स्थायी रोजगार नहीं मिला। ऐसे मुश्किल समय में पत्नी नगिया देवी का भरोसा प्रवीण के लिए ताकत बना।
जीविका के पैसे खड़ा किया कपड़ों का कारोबार
उन्होंने नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय अपने हुनर से रोजगार खड़ा करने की सलाह दी। नगिया देवी जीविका समूह से जुड़ी थीं। उन्होंने जीविका से एक लाख रुपये का ऋण लिया और पति के स्वरोजगार की नींव रखने में आर्थिक सहयोग दिया।
पत्नी के भरोसे और वर्षों के सिलाई अनुभव को आधार बनाकर प्रवीण ने गांव में कपड़े तैयार करने का काम शुरू किया। शुरुआत महज तीन सिलाई मशीनों से हुई।
सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने नाइटी, ट्रैकसूट, शर्ट-पैंट समेत विभिन्न प्रकार के कपड़े तैयार करने शुरू किए। धीरे-धीरे तैयार कपड़ों की गुणवत्ता की पहचान बढ़ी और मांग भी बढ़ने लगी।
कारोबार बढ़ा तो मशीनों की संख्या भी बढ़ती गई। आज प्रवीण के पास 10 सिलाई मशीनें हैं और इनके माध्यम से करीब 15 लोगों को रोजगार मिल रहा है।
इनमें गांव की पांच महिलाएं भी शामिल हैं। सिलाई के काम से जुड़कर ये महिलाएं अपने परिवार की आमदनी बढ़ाने में सहयोग कर रही हैं।
गांव की मशीनों से कई जिलों तक पहुंच रहे कपड़े
प्रवीण के तैयार कपड़ों की बिक्री अब गांव तक सीमित नहीं है। नाइटी, ट्रैकसूट, शर्ट-पैंट समेत अन्य कपड़े दाउदनगर के थोक विक्रेताओं को भेजे जाते हैं। वहां से इनकी आपूर्ति अलग-अलग जिलों और राज्यों के खुदरा बाजार तक होती है।
कपड़े तैयार करने के लिए कच्चा माल पटना से मंगाया जाता है। इस तरह गांव में तीन मशीनों से शुरू हुआ काम अब बड़े बाजार से जुड़ चुका है। प्रवीण बताते हैं कि नौकरी छूटने के बाद कुछ समय तक लगा कि परिवार चलाना मुश्किल हो जाएगा।
काम की तलाश में भटकने की बजाय अपने हुनर को ही रोजगार का माध्यम बनाने का निर्णय लिया। पत्नी ने आर्थिक सहयोग के साथ भरोसा दिया तो आत्मविश्वास बढ़ा।
मेहनत जारी रखी और धीरे-धीरे कारोबार खड़ा हो गया। नगिया देवी कहती हैं कि परिवार के सामने संकट था, लेकिन हिम्मत हारने के बजाय रास्ता तलाशना जरूरी था।
जीविका से मिले ऋण का उपयोग पति के रोजगार को शुरू करने में किया। आज इसी काम से परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरी है और गांव के कई लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।
जीविका समूह से जुड़ी महिलाओं को स्वरोजगार के लिए ऋण के साथ मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाता है। नगिया देवी ने ऋण का उपयोग परिवार की आय बढ़ाने वाले रोजगार में किया। उनके सहयोग से शुरू हुआ सिलाई कार्य आज कई लोगों के लिए रोजगार का माध्यम बन गया है। यह सराहनीय पहल है। -पवन कुमार, डीपीएम, जीविका।
