शैलेश कुमार, हरिहरक्षेत्र सोनपुर :

एक दौर में सोनपुर मेले में नौटंकी की मल्लिका गुलाब बाई का जलवा होता था। जब वह स्टेज पर जलवा फरोश होती थीं तो लोगों के दिलों की धड़कनें रुकने लगती थीं और वे सांस लेना तक भूल जाते थे।

कहते हैं कि प्रख्यात फिल्मकार और एक्टर राजकपूर की फिल्म तीसरी कसम के लोकप्रिय गीत पान खाए सैंया हमारो को शोहरत की बुलंदियों और आम और खास की जुबान पर चढ़ाने वाली गुलाब बाई की नौटंकी ही थी। उस दौर में यह गीत ग्राम्य अंचलों में लोगों के सिर चढ़कर बोलता था।

जानकारी हो कि 20 वीं सदी के पूर्वा‌र्द्ध के कुछ दशकों से लेकर उत्तरा‌र्द्ध के कुछ दशकों तक हिन्दी पट्टी में नौटंकी ही मनोरंजन का सबसे प्रमुख साधन हुआ करती थी। खासकर अवसर जब सोनपुर मेले का हो। इसे देखने वालों में आम तो होते ही थे खास भी हुआ करते थे। नौटंकी में मेलोड्रामा था, डायलाग बोले जाते थे। हास्य-व्यंग का भरपूर पुट हुआ करता था। दर्शकों को बांधे रखने के लिए गीत-संगीत भी होता था पर उस समय तक नौटंकियों में महिलाओं की भूमिका भी पुरुष पात्र ही निभाया करते थे। सोनपुर मेले में शाम को शो शुरू होता था और सुबह होने तक चलता रहता था।

1930 के दशक में महिलाओं ने नौटंकी में काम करना शुरू किया। यह वह दौर था जब हिन्दी पट्टी में एक नए मध्यम वर्ग का उदय हो रहा था जो सिनेमा और यूरोपीय थियेटर से अपना जुड़ाव ज्यादा महसूस करता था। जैसे ही नौटंकी में महिलाओं ने काम करना शुरू किया, उसका कायापलट हो गया। उसके पहले किसी ने भी महिलाओं को खुले में नौटंकी के स्टेज पर काम करते नहीं देखा था। गुलाब बाई पहली महिला थी जिसने नौटंकी में स्टेज पर लीड हिरोइन के रूप में नृत्य-गीत पेश करना शुरू किया।

उस समय भी नौटंकी में गीतों के माध्यम से दहेज प्रथा, महिला प्रताड़ना के खिलाफ आवाज उठाई जाती थी। बाद में गुलाब बाई ने अपनी खुद की थियेटर कंपनी खोल ली। 1990 में गुलाब बाई को पद्मश्री से नवाजा गया।

1970 आते-आते महिलाओं का परफार्मेंस भी नौटंकी की अवनति को नहीं रोक सका। छोटे-छोटे शहरों में खुले सिनेमा हॉल और बड़े शहरों में टीवी आ जाने से नौटंकी के प्रति लोगों की चाहत को इस कदर कम किया कि इसके दर्शक मिलने बंद हो गए।

हर साल सोनपुर मेले में गुलाब बाई के नाम से चलते हैं थियेटर

यह आश्चर्य की बात है कि हर साल सोनपुर मेले में गुलाब बाई के नाम से कई थियेटर खुलते हैं। शायद यह इसलिए कि आज भी यहां के लोग उस महान अदाकारा की याद को ¨जदा रखना चाहते हैं जिसने मनोरंजन की विधा नौटंकी को उसकी बुलंदियों पर पहुंचाया था। सोनपुर के कई पुराने लोग गुलाब बाई की चर्चा चलते ही पुरानी स्मृतियों में खो जाते हैं। वे कहते हैं कि शाम ढलते ही पेट्रोमैक्स जल उठते थे और स्टेज सज जाता था। मेले में आए लोग बोरा-चट्टी या पुआल बिछाकर नौटंकी शुरू होने की प्रतीक्षा करते थे। गुलाब बाई के स्टेज पर आते ही पूरी रात कैसे बीत जाती थी, पता ही नहीं चलता था। लैला-मजनू, राजा हरिश्चंद्र आदि नाटकों में गुलाब बाई ने जो अदाकारी पेश की वह बस यादों में है। कहने को तो सोनपुर मेले में हर साल थियेटर लगाए जाते हैं पर अब उसमें केवल फिल्मी गीत की धुन पर भोंडे नृत्य हैं जिसे कहीं से भी कला तो नहीं ही कहा जा सकता।

Posted By: Jagran