विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 11, 2013 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

मिट्टी से लगाव ने इंजीनियर को बनाया अभिनेता

By Edited By:
Published: Fri, 11 Jan 2013 06:41 PM (IST)Updated: Fri, 11 Jan 2013 06:43 PM (IST)

News Article Hero Image

निज प्रतिनिधि, सिवान : इंजीनियरिंग के नीरस व भावना शून्य माहौल में भी एक युवक के हृदय में साहित्य व कला का एक बीज अंकुरित व प्रस्फुटित होता रहा। अब वह बीज वृक्ष का रूप धारण कर भोजपुरी सिनेमा को नया अर्थ देने की ओर अग्रसर है। यह प्रयास रंग लाया तो भोजपुरी की समृद्ध विरासत के अनुसार भोजपुरी सिनेमा की छवि भी बनने लगेगी। सिवान जिले के रघुनाथपुर प्रखंड के कौंसड़ गांव के रहने वाले युवा मनोज का नामांकन जब सीपेट(सेंट्रल इंस्टीटयट आफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग) में हुआ था तब उन्होंने सोचा भी नहीं था कि वे एक दिन अभिनेता बनेंगे। कालेज से पास होने के पूर्व ही उन्हें एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी मिल गयी। लंदन व काम्पैक में रहकर नौकरी करते हुए इन्हें पूरी दुनिया को नजदीक से देखने का अवसर मिला। पश्चिम के चकाचौंध में भी अपनी मिट्टी व संस्कृति से लगाव कम होने की जगह और बढ़ता ही चला गया। वह सहज व नैसर्गिक लगाव भोजपुरी गीत व कथा के रूप में प्रकट होने लगा। लेखन जारी रहा और मात्र पन्द्रह वर्षो में ही मनोज की ख्याति मनोज भावुक के रूप में देश-विदेश में होने लगी। इनका भोजपुरी गजल संग्रह-तस्वीर जिंदगी की, भारतीय भाषा परिषद सम्मान के लिए चयनित हुआ। गुलजार व गिरीजा देवी ने संयुक्त रूप से उन्हें सम्मानित किया। पटकथा व गीत लेखक के रूप में भोजपुरी फिल्म जगत में प्रवेश करने वाले मनोज भावुक अब भोजपुरी फिल्मों में बतौर अभिनेता काम करने लगे हैं। वर्ष 2012 की शुरूआत में उनकी पहली फिल्म 'सौगंध गंगा मइया के' रिलीज हुई। इनकी दूसरी फिल्म 'रखवाला' 26 जनवरी को रिलीज होने वाली है। 'सौगंध गंगा मइया के' की तरह ही रखवाला में भी मनोज एक ईमानदार पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई है।

अपने गांव में ठेठ भोजपुरिया की तरह दलान पर बैठे भावुक से बुधवार को वर्तमान दौर की भोजपुरी फिल्मों पर बात होती है। थोड़ा सोचते हुए वे कहते हैं-दिशाहीनता की स्थिति है, भोजपुरी सिनेमा भूलभूलइया में है, ऐसे में अपनी अलग पहचान कैसे बनेगी? सिनेमा क्यों बना रहे हैं? किसके लिए बना रहे हैं? यह सोचना पड़ेगा। भोजपुरी भाषियों की संख्या पूरे विश्व में बीस करोड़ से भी अधिक है। ओवरसिज (सात समुंदर पार) में भी भोजपुरी भाषी करोड़ों में हैं। सिनेमा बनाने वालों को उनका भी ख्याल रखना होगा। भोजपुरी सिनेमा के विकास की चर्चा पर सधे हुए व सांकेतिक लहजे में उन्होंने कहाकि-चलनी में पानी भरत, बीतल उमर तमाम, तबहूं बा मन में भरम, कईनी केतना काम..। भावुक कहते हैं भोजपुरी में उठ खड़ा होने की क्षमता है।

वे कहते हैं भोजपुरी सिनेमा के विखरे इतिहास को सहेजने और समेटने की कोशिश कर रहा हूं। इसी कोशिश में मैने अमिताभ बच्चन सहित पचास से अधिक फिल्मी हस्तियों का साक्षात्कार लिया है। इन्होंने भोजपुरी सिनेमा के विकास यात्रा पर शोध कार्य भी पूरा किया है। भोजपुरी सिनेमा के 1948 से लेकर 2011 तक इतिहास पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म 2012 में बनायी।

मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर