पहली बार भोजपुरी में लिखा गया ‘भोजपुरी सिनेमा का इतिहास’, मनोज भावुक को मिला चौधरी कन्हैया सिंह सम्मान
पहली बार भोजपुरी में 'भोजपुरी सिनेमा का इतिहास' नामक किताब लिखी गई है, जिसके लिए मनोज भावुक को चौधरी कन्हैया सिंह सम्मान मिला है। यह किताब भोजपुरी सिनेमा के विकास और इतिहास पर केंद्रित है, जो प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है। मनोज भावुक का यह कार्य भोजपुरी सिनेमा के इतिहास को संरक्षित करने में मदद करेगा।

मनोज भावुक को मिला चौधरी कन्हैया सिंह सम्मान
जागरण संवाददाता, छपरा। भोजपुरी साहित्य और सिनेमा की दुनिया में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज करते हुए सुप्रसिद्ध भोजपुरी साहित्यकार मनोज भावुक को उनकी पुस्तक भोजपुरी सिनेमा के संसार’ के लिए प्रतिष्ठित चौधरी कन्हैया सिंह पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
यह सम्मान अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन भोजपुरी की सबसे पुरानी संवैधानिक और प्रतिष्ठित संस्था द्वारा अमनौर, छपरा में आयोजित 28वें अधिवेशन में प्रदान किया गया।
अरुण शंकर प्रसाद ने मनोज भावुक को सम्मानित किया
सम्मान समारोह में पर्यटन, कला एवं संस्कृति मंत्री अरुण शंकर प्रसाद ने मनोज भावुक को सम्मानित किया। तीन दिवसीय (28–30 नवंबर 2025) इस अधिवेशन में बिहार के उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, मंत्री नितीन नवीन, श्रम संसाधन मंत्री संजय सिंह टाइगर, सांसद मनोज तिवारी, प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री अक्षरा सिंह, गायिका कल्पना पटवारी सहित देश-विदेश से आए लेखक, कवि, पत्रकार, कलाकार एवं भोजपुरी शोधकर्ताओं ने भाग लिया।
मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित भोजपुरी सिनेमा के संसार भोजपुरी सिनेमा के इतिहास पर भोजपुरी भाषा में लिखी गई पहली विस्तृत और शोधपरक पुस्तक मानी जा रही है।
1931 से अब तक के भोजपुरी फिल्मी सफर
इसमें वर्ष 1931 से अब तक के भोजपुरी फिल्मी सफर का क्रमबद्ध और प्रामाणिक विवरण मौजूद है। इंजीनियर के रूप में अफ्रीका और इंग्लैंड में कार्य कर चुके मनोज भावुक लंबे समय से भोजपुरी सिनेमा और साहित्य के बीच एक सशक्त सेतु की भूमिका निभा रहे हैं।
मनोज भावुक सिर्फ इतिहासकार ही नहीं, बल्कि भोजपुरी फिल्मों के प्रतिष्ठित गीतकार भी हैं। उनके लिखे गीतों को देश के प्रमुख गायक लगातार गा रहे हैं।
तोर बउरहवा रे माई से लोकप्रियता हासिल करने वाले भावुक की हालिया फिल्म आपन कहाए वाला के बा के सभी गीत भी उन्होंने ही लिखे हैं, जिन्हें तीन पीढ़ियां साथ बैठकर सुन सकती हैं। भोजपुरी शब्दावली और लोकसंस्कारों को लेकर उनकी संवेदना और कारीगरी उन्हें समकालीन समय का महत्वपूर्ण भोजपुरी कवि बनाती है।

कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।