मृत्युंजय कुमार त्रिपाठी, छपरा

आज यानी 30 अक्टूबर, बिहार के प्रथम भोजपुरी राष्ट्रगीत का दर्जा पा चुकी कविता 'बटोहिया' के अमर रचयिता रघुवीर नारायण की 127वीं जयंती है, और इस साल उनकी इस रचना की 100वीं सालगिरह भी। एक दिन पूर्व, शनिवार को उनके गृह जिले में लोगों से यह प्रश्न पूछने पर कि रघुवीर नारायण को जानते हैं? जवाबी प्रश्न होता है- यह रघुवीर नारायण कौन है? आश्चर्य, दुख से भरे मन के साथ जिलेवासियों की इस 'स्वार्थप्रेरित स्मृति' पर तरस खाने को जी चाहता है। बुद्धिजीवी वर्ग में शामिल अनेक लोगों से दूसरा सवाल जब अमर कृति 'बटोहिया' के बारे में किया तो, ज्यादातर जवाब रहे- 'बटोहिया, विदेशिया, भिखारी ठाकुर आला नू?'

बटोहिया : अर्श से फर्श

1970 तक बिहार स्टेट बुक कमेटी द्वारा कक्षा 10 एवं 11 की प्रकाशित हिंदी गद्य पद्य संग्रह के आवरण पृष्ठ पर 'बटोहिया' का मुद्रण अनवरत होता रहा था। गीत की कीर्ति सरहद पार मारीशस, फिजी, त्रिनिदाद, गुयाना तक थी। लेकिन, दुर्भाग्यवश अपनी बढ़ती उम्र के साथ बटोहिया की वह लोकप्रियता बढ़ने के बजाय छिनती चली गई। भोजपुरी क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं, व्यक्तियों ने भी इस गीत को लोक कंठ में उतारने के लिए प्रयास किया। छपरा में कुमार प्रिंटर के प्रो. कुमार विनय मोहन सिंह स्मृतियों से टटोलते हैं- '1984 से 91 तक शिक्षक रामजी सिंह मुझसे इस गीत को जिल्द (बुक कवर) पर उद्धृत करवाते थे। फिर वे विद्यालयों में घूमकर उसे बच्चों में वितरित करते। अब वे नहीं हैं।' धीरे-धीरे बटोहिया के लिए, उसी की माटी के लोगों के यह प्रयास बंद हो गए, या प्रयास करने वाले लोग नहीं रहे, फलत: इस गीत के बारे में सवाल हो रहे हैं- कौन बटोहिया? कौन रघुवीर?

सुंदर सुभूमि भैया

'सुन्दर सुभूमि भैया भारत के देसवा से, मोरे प्रान बसे हिम खोह रे बटोहिया..।' 1857 की क्रांति के असफल होने के बाद भारतीयों की स्वतंत्रता-प्राप्ति की उम्मीद मद्धिम होने लगी तो राष्ट्रकवियों ने अपनी लेखनी को हथियार बनाया। डा. राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से, अंग्रेजी कविताओं की रचना में सिद्ध रघुवीर नारायण के हाथों ने लेखनी उठाई और मातृ भाषा भोजपुरी में अमर कृति 'बटोहिया' की रचना की। राष्ट्र प्रेम और भक्ति से ओत-प्रोत कर देने वाली इस रचना की ख्याति एक ही वर्ष में 1912 में बंगलाभाषाई क्षेत्र कोलकाता की गलियों तक फैल गयी। सर यदुनाथ सरकार ने रघुवीर बाबू को लिखा- 'आई कैन नॉट थिंक आफ यू विदाउट रिमेम्बरिंग योर बटोहिया।' स्वतंत्रता संग्राम के समय यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों का कंठहार बन चुका था। इसकी तुलना बंकिमचन्द्र के 'वंदेमातरम' तथा इकबाल के 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' से हुई। बिहार प्रवास के दौरान कई कंठों से बटोहिया का सस्वर पाठ सुन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बोल पड़े थे- 'अरे, यह तो भोजपुरी का वंदे मातरम है।'

और अमर कवि बन गए रघुवीर

अंग्रेजी में तमाम कविताएं लिखने वाले रघुवीर नारायण भोजपुरी की एक ही कविता 'बटोहिया' से अमर कवियों में शुमार हो गए। इस गीत की प्रशंसा पंडित रामावतार शर्मा, डा. राजेन्द्र प्रसाद, सर यदुनाथ सरकार, पं. ईश्वरी प्रसाद शर्मा, भवानी दयाल संयासी, आचार्य शिवपूजन सहाय, डा. उदय नारायण तिवारी सहित तत्कालीन सभी राष्ट्रकवियों ने की। सन 1905 में रघुवीर बाबू ने 'ए टेल आफ बिहार' की रचना की। इंग्लैंड के राष्ट्रकवि अल्फ्रेड आस्टीन ने सन 1906 में पत्र लिखा और उनकी तुलना अंग्रेजी कवियों से की। पत्रिका लक्ष्मी के अगस्त 1916 के अंक में महनीय कवि शिवपूजन सहाय ने लिखा था- 'बटोहिया कविता का प्रचार बिहार के घर-घर में है। शहर और देहात के अनपढ़ लड़के इसे गली-गली में गाते फिरते हैं, पढ़े-लिखों का कहना ही क्या है। यदि एक ही गीत लिखकर बाबू रघुवीर नारायण अपनी प्रतिभाशालिनी लेखनी को रख देते तो भी उनका नाम अजर और अमर बना रहता।'

'भारत भवानी' ने भी दिलाई ख्याति

रघुवीर बाबू की दूसरे सबसे चर्चित कविता भारत भवानी है। यह 16 सितंबर 1917 ई. को पाटलिपुत्रा पत्र में छपी थी। हालांकि इसकी रचना सन 1912 ई. में ही हो चुकी थी और उस वर्ष अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के पटना अधिवेशन में वंदेमातरम की जगह भारत भवानी का ही पाठ हुआ था। बाबू रघुवीर नारायण के नाम तथा कृतियों का उल्लेख आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने 'प्रोग्रेस आफ बिहार थ्रू द एजेज' में किया है। इसके पूर्व बंगला साहित्येतिहास में नरेन्द्र नाथ सोम ने अपनी पुस्तक 'मधुस्मृति' में उनकी कृतियों का मूल्यांकन कर बिहारवासियों को चौंका दिया था।

जन्म- 30 अक्टूबर 1984

जन्म स्थान- दहियावां, छपरा

पिता- जगदेव नारायण

व्यक्तित्व- 'सिर पर गोल टोपी, आंखों पर निक्कल फ्रेम का चश्मा, उन्नत ललाट पर उभरी रेखाएं, मुखमंडल से फूटता तेज, घुटनों के नीचे पहुंची धोती या कभी चूड़ीदार पायजामा भी। प्रतिभाशाली, मृदुभाषी, राष्ट्रवादी।

शिक्षा- विद्यालयी शिक्षा जिला स्कूल छपरा, पटना कालेज से अंग्रेजी प्रतिष्ठा के साथ स्नातक।

1940 के बाद पूर्ण संयासी जीवन

मृत्यु- 1 जनवरी 1955

हिंदी में रचित पुस्तकें- रघुवीर पत्र-पुष्प तथा रघुवीर रसरंग। रंभा खंडकाव्य अप्रकाशित

सम्मान- बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा सम्मानित

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