कोसी के गांधी नाम से प्रसिद्ध हैं पंचगछिया के स्वतंत्रता सेनानी रामबहादुर सिंह
कोसी के गांधी नाम से प्रसिद्ध रामबहादुर सिंह 14 वर्ष की आयु से ही देश की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए अपनी जीवन समर्पण कर दिया। छूआछूत मिटा सभी जाति समुदाय को संगठित कर स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। रामबहादुर सिंह का जन्म सत्तरकटैया प्रखंड के पंचगछिया गांव में पांच मई 1901 को हुआ था।

संसू, सत्तरकटैया ( सहरसा )। कोसी के गांधी नाम से प्रसिद्ध रामबहादुर सिंह 14 वर्ष की आयु से ही देश की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए अपनी जीवन समर्पण कर दिया। छूआछूत मिटा सभी जाति समुदाय को संगठित कर स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। रामबहादुर सिंह का जन्म सत्तरकटैया प्रखंड के पंचगछिया गांव में पांच मई 1901 को हुआ था। बबुआ सिंह के पुत्र रामबहादुर में बचपन से ही देशभक्ति की जज्बा था। 17 साल की उम्र में इनकी शादी कृती देवी से हुई और उसके बाद वे देश में शुरू हुए सभी स्वतंत्रता आंदोलन में कोसी का नेतृत्व करने लगे।
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कई बार कर चुके जेल की यात्रा
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फरवरी 1919 में बिहार में खिलाफत आंदोलन की शुरूआत हुई। जगह - जगह जनसभाएं होने लगी। स्वामी सहजानंद सरस्वती के निर्देश पर रायबहादुर सिंह ने सहरसा एवं सुपौल में हस्ताक्षर अभियान शुरु किया। छह अप्रैल 1919 को पंचगछिया में हड़ताल के लिए एक सभा हुई। इसमें उन्होंने रौलेट एक्ट के खिलाफ जोरदार भाषण दिया था।इसकी सूचना मिलते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह उनकी पहली जेल यात्रा थी। इसमें उन्हें एक वर्ष दस माह की राजा मिली लेकिन बीच में ही उन्हें रिहा कर दिया गया। जेल से छूटने के बाद नागपुर अधिवेशन में शामिल हुए और वहां से लौटते ही जनसहयोग आंदोलन की तैयारी में जुट गए। परिणामस्वरूप रामबहादुर सिंह को फिर से गिरफ्तार कर लिया और उन्हें 22 महीने तक जेल की यातनाएं भोगनी पड़ी। रामबहादुर सिंह नमक कानून के विरुद्ध लोगों को गोलबंद करने के कारण उन्हें तीसरी बार गिरफ्तार कर लिया गया। 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान शराब एवं विदेशी कपड़े के विरोध के कारण एक बार फिर इन्हें गिरफ्तार कर 17 महीने जेल में रखा गया। 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान इन्हें पांचवीं बार गिरफ्तार कर एक वर्ष चार मह की सजा सुनाई गई थी।
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छूआछूत का विरोध कर मिटाया भेदभाव
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रामबहादुर सिंह को पता था कि जब तक पूरा समाज एक नहीं होगा देश को आजादी मिलने में परेशानी होगी, इसके लिए उन्होंने सामाजिक परिवर्तन का भी काफी प्रयास किया। सभी जाति धर्म प्रदाय को एकजुट करने के लिए बरियाही के सैफावाद में एक प्रशिक्षण शिविर खोला। छूआछूत निवारण , नशाबंदी , विदेशी वस्त्र बहिष्कार पर काम होने लगा। एक साथी तुलमोहन राम को भोजन परोसने का दायित्व दिया गया। पंचगछिया अस्पताल में आमसभा कर हरिजन कर्मी रामस्वरूप के हाथों पानी मंगवा कर सभा में मौजूद लोगों के सामने पी गए और कहा कि मैंने रामस्वरूप के हाथों पंचामृत जल पी लिया है। उनके निर्देशानुसार ही गांधी के श्राद्ध कर्म के दिन पटोरी स्थित सोशल क्लब में गांधी का स्मारक का शिलान्यास लालजी डोम द्वारा करवाया गया। राजघराना संपोषित सामंत प्रभावित दबदबा वाले क्षेत्र में एक दलित द्वारा गांधी स्मारक का शिलान्यास करने का उद्देश्य जाति-पाति को खत्म करने का संदेश प्रचारित करना था।
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देश की आजाद के लिए दिया दान
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15 जनवरी 1934 को बिहार में आए महा विध्वंसकारी भूकंप के बाद बिहार यात्रा पर निकले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का पंचगछिया में पदार्पण हुआ था। दरभंगा निर्मली होते सुपौल पहुंचने के बाद बापू के काफिले का नेतृत्व स्वतंत्रता सेनानी अमरेंद्र नारायण सिंह उर्फ हीरा व राम बहादुर सिंह के संयोजकत्व में उनका पदार्पण पंचगछिया में हुआ था। जब बापू को आयोजकों ने भोजन के लिए आग्रह किया तो उन्होंने खाने की जगह कुछ ऐसा दान देने की बात कही जो स्वतंत्रता संग्राम में काम आए। उनकी पत्नी कृती देवी सहित अपने देवरानियों एवं ग्रामीणों ने भारी मात्रा में सोना-चांदी जनकल्याण कार्य के लिए दान दिया था। देश की आजादी के बाद गंभीर रूप से बीमार हो गए। नवंबर 1949 को पांडिचेरी चले गए , जहां से चरबाल आश्रम गए। लेकिन अगले ही वर्ष वापस अपने घर लौट आए। रास्ते में राष्ट्रपति भवन में राजेंद्र प्रसाद और सदाकत आश्रम में सभी साथियों से मिले। वह उन सबसे आखिरी मुलाकात थी। पांच जुलाई 1950 को उनका देहांत हो गया।
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