गुजर गई दो पीढि़यां, नहीं हो सका पुनर्वास
संसू नवहट्टा (सहरसा) दो पीढि़यां गुजर गई और अब तीसरी पीढ़ी को सरकारी घोषणा के जमीन पर उतरने का बेसब्री से इंतजार है। फिलहाल वो पूर्वी कोसी तटबंध पर झोपड़ी डालकर जीवन निर्वाह कर रहे हैं।

संसू, नवहट्टा (सहरसा): दो पीढि़यां गुजर गई और अब तीसरी पीढ़ी को सरकारी घोषणा के जमीन पर उतरने का बेसब्री से इंतजार है। फिलहाल वो पूर्वी कोसी तटबंध पर झोपड़ी डालकर जीवन निर्वाह कर रहे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी तटबंध के निर्माण के बाद कोसी नदी की धारा के बीच रहने वालों को आज भी पुनर्वास कार्यो का इंतजार है।
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1954 में शुरू हुआ था तटबंध निर्माण :
वर्ष 1954 में पूर्वी और पश्चिमी कोसी तटबंध के निर्माण कार्य प्रारंभ होने के साथ ही प्रारंभ इस संघर्ष का परिणाम 65 वर्ष बाद भी नहीं मिल पाया है। कोसी विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए चिह्नित जमीन पर कब्जे को लेकर कहासुनी और मारपीट आम बात है। कई परिवारों को तो अब तक पुनर्वास की जमीन भी मयस्सर नहीं हो सकी।
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1956 में शुरू हुआ विस्थापितों का संघर्ष
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तटबंध निर्माण के कारण दोनों तटबंध के बीच फंसे गांव की बड़ी आबादी के साथ ही तटबंध निर्माण स्थल के बीच फंसे गांव के लोगों के पुनर्वास की समस्या उत्पन्न हुई। तत्कालीन सरकार के उदासीन रवैया के विरोध में जन आंदोलन शुरू हुआ। तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अध्यक्ष भूषण गुप्ता की अध्यक्षता में 1956 के मध्य तक एक जन-आन्दोलन की शुरुआत हो चुकी थी। उन्होंने उन लोगों की तरफ से आवाज उठाई जो तटबंधों के बीच में फंसने वाले थे और जिनकी जमीन तटबंधों के निर्माण में पड़ने वाली थी। बिहार विधान सभा की एक लोक लेखा समिति के अनुसार 1958 से 1962 के बीच करीब 12,084 परिवारों को तटबंधों के बाहर रिहायशी जमीन का आंवटन किया गया । बाढ़ विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र ने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है कि कोसी तटबंधों के बीच 380 गांव हैं जोकि चार जिलों के 13 प्रखंडों में फैले हुए हैं। इन गांव के शत-प्रतिशत लोगों को पुनर्वास की व्यवस्था करने में सरकार विफल रही ।
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कटाव विस्थापितों के लिए ले आउट कार्य रहा अधूरा
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कोसी नदी के कटाव से विस्थापित छतवन, पहाड़पुर, असई के लोगों के लिए यह पुनर्वास तय किया गया था। वर्ष 2011 से लेआउट का शुरू काम आज तक आधा अधूरा ही है। 48 एकड़ 78 डिसमल जमीन को ले हमेशा तनाव का करण बना रहता है। वर्ष 2011 में तत्कालीन पुनर्वास पदाधिकारी ने जमीन के ले आउट का काम ललन प्रसाद अमीन को सौंपा था। उनका स्थानांतरण भी हो गया और एक भी प्लाट का ले आउट नहीं हो सका। 48 एकड़ 78 डिसमल जमीन को लोग अपने मन से जहां-तहां कब्जा कर रहे हैं। विस्थापितों क्या स्थान पर गैर विस्थापित बड़े भू-भाग में कब्जा कर भू-धारक पुनर्वास की जमीन का खरीद परोख्त भी कर रहे हैं। न केवल जमीन बल्कि कई लोग रास्ते पर भी कब्जा कर बागवानी व बांसवाड़ी बना लिया है।
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तटबंध के स्पर पर बसे हैं विस्थापित
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पुनर्वास की जमीन का ले-आउट तैयार कर विस्थापितों को नहीं दिए जाने के कारण ही बुचाय ठाकुर, देवो मिस्त्री, बिन्दो शर्मा, मसोमात रेशमा समेत कई लोग आज भी गोड़पारा कृष्ण मंदिर के समीप स्पर पर एवं बलवा स्पर पर बसे हुए हैं। विस्थापितों ने बताया कि दबंग लोगों ने जमीन में मिट्टी भराई के बाद भी घर बनाने नहीं दिया। 1984 में तटबंध टूटने के बाद रिटायर्ड बांध पर बड़ी संख्या में लोग बसे । शाहपुर , मझौल एवं परसबन्ना के समीप पहाड़पुर, छतवन , असई , बरियाही आदि गांव के सैकड़ों विस्थापित लोग बसे हुए हैं ।
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सरकारी योजना से वंचित हैं लोग
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तटबंध पर बसे कोसी विस्थापित लोग सरकारी योजनाओं से भी वंचित हैं। वे जहां तटबंध पर बसे हुए हैं और जहां के मूल निवासी हैं इसको लेकर पंचायत का निर्धारण समस्या बनी हुई है। बसे हुए भूमि का स्वामित्व नहीं होने की वजह से प्रधानमंत्री आवास योजना से वंचित हैं। सरकार की घोषणा के बावजूद ऐसे लोगों के सर्वे का कार्य धीमी गति से चल रहा है ।
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कोट
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विस्थापित के पुनर्वास की समस्या को लेकर जिले के उच्चाधिकारी को अवगत कराया जाएगा। प्रशासन और विभागीय निर्देशानुसार समुचित कदम उठाया जाएगा। अनिल कुमार
अंचलाधिकारी, नवहट्टा
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