जासं, डेहरी आनसोन: डेहरी आनसोन स्थित एनीकट के सोन तट पर झारखंडी महादेव मंदिर अवस्थित है। यहां अति प्राचीन शिवलिग है, जिनके दर्शन-पूजन से मनोकामना पूर्ण होती है।मान्यता है कि लगभग तीन हजार साल पुराना यह शिवलिग है। इसे आदिवासी सावक जातियों ने स्थापित किया था। दूर-दूर तक फैली आस्था के कारण यहां सावन सोमवारी को 50 हजार से अधिक लोग जलाभिषेक करते रहे हैं। हालांकि सावन में इस बार कोविड संक्रमण से बचाव को लेकर मंदिर का पट बंद रहेगा व लोग आस्था के घर से ही पूजन करेंगे। मंदिर का इतिहास:

झारखंडी महादेव का प्रसिद्ध मंदिर पर अंकित शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण सन 1876 में किया गया है। मान्यता है कि लगभग तीन हजार साल पुराना यह शिवलिग है। इसे आदिवासी सावक जातियों ने स्थापित किया था। मंदिर परिसर में एक कुआं, शिवलिग,चतुर्मुख लघु स्तंभ तथा नवलखा मंदिर में स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा है। बलुआ पत्थर से बने शिवलिग का व्यास 22 सेमी तथा ऊंचाई 20 सेंमी है। चतुर्मुख लघुस्तंभ की ऊंचाई 50 सेमी तथा उसकी भुजाएं 21 सेमी की हैं। इसपर वाराह, दही मंथन, कंस द्वारा देवी को शिला पर पटकने, पूतना वध तथा शेषनाग का अंकन है। मंदिर की विशेषता :

प्राचीन मान्यता के अनुसार झारखंडी महादेव मंदिर का महत्व प्राचीन समय से रहा है। यह क्षेत्र सिद्ध स्थल रहा है। शोणक्षी अब सोन नदी के तट पर स्थित इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इतिहासकार डा. श्यामसुंदर तिवारी बताते हैं कि शिलालेख भले ही नया है, कितु इसमें अवस्थित प्रतिमाएं पुरातात्विक महत्त्व की पूर्व मध्यकालीन हैं।

कहते हैं मुख्य पुजारी : झारखंडी महादेव बाबा अपनी पूजा आराधना से कहीं अधिक अपने भक्तों की सेवा से प्रसन्न होते हैं। ऐसे में इसका ख्याल रखा जाता है कि दर्शन के लिए आए किसी भक्तों को कोई दिक्कत न हो। इसकी व्यवस्था प्रशासन व मंदिर कमेटी करती है। इस वर्ष कोरोना गाइड लाइन का पालन करते हुए मंदिर में पूजा अर्चना पर रोक रहेगी।

पुरषोत्तमाचार्य, मुख्य पुजारी कहते हैं सचिव : झारखंडी महादेव मंदिर की प्राचीनता का वर्णन धर्मग्रंथों में भी है। यहां भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा करने वालों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस सावन में कोराना महामारी के कारण मंदिर में प्रवेश व पूजा पर रोक लगाई गई है।

शशि सिंह, सचिव

झारखंडी महादेव मंदिर समिति-डेहरी

Edited By: Jagran