जागरण संवाददाता, सासाराम : रोहतास। लगभग दो दशक पूर्व शहर में दर्जन भर ऐसे तालाब थे, जिससे लोग नहाने, कपड़ा धोने व रोजमर्रा के काम करते थे। लेकिन आज उन तालाबों का पानी प्रदूषित हो गया है, तालाब में मौजूद कचरा व अन्य पदार्थों की रासायनिक क्रिया से यह जहरीला पानी अब उपयोग के लायक नहीं है। यहां तक कि जानवरों के पीने लायक भी नहीं बचा है। शहरी क्षेत्र के तालाब कचरा डंपिग के आसान स्त्रोत बन गए हैं, जो पर्यावरण की सेहत के लिए भी नुकसानदेह साबित हो रहे हैं। कुछ वर्षों पूर्व बेंगलूरू से आई एक खबर ने लोगों को सकते में डाल दिया था। वहां के बेल्लानदुर झील से अचानक धुआं निकलने लगा था। दावा किया गया कि यह हादसा झील में मौजूद कचरा व प्रदूषण की वजह से हुआ है। शहर की तालाबों के साथ भी ऐसी बर्बरता जारी रही, तो भविष्य में ऐसे हादसे यहां भी हो सकते हैं। जहां अठखेलियां करती थीं मछलियां, अब पलते हैं कीड़े :

व्यवस्थागत लापरवाही व स्वार्थ के चलते शहर के कई तालाबों की रमणीयता समाप्त हो गई है। तालाबों में कचरा डालने से उसका पानी इतना गंदा है कि उसमें पल रहे कई जलीय जीव तक समाप्त हो गए हैं। पानी प्रदूषित होने की वजह से उसमें खतरनाक ढंग से ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। जिससे जलीय जीवों को सांस लेना मुश्किल हो जाता है। दो दशक पहले तक कई तालाबों में अठखेलियां करती मछलियां खत्म हो गई हैं। उनकी जगह अब संक्रामक रोग फैलाने वाले कीड़े पल रहे हैं। जिससे मनुष्य तो दूर पशु पक्षी भी उन तालाबों का पानी उपयोग करने से कतराते हैं। कभी शहर की शान कहे जाने वाले कई तालाब, बावड़ी, झील जैसे जलस्त्रोत लोगों की लापरवाही व सरकारी उपेक्षा के कारण दम तोड़ रहे हैं। गंदगी का पर्याय बना दुर्गा कुंड तालाब :

शहर के फजलगंज में अवस्थित प्रसिद्ध दुर्गा कुंड तालाब अतिक्रमण के चलते गंदगी का पर्याय बनता जा रहा है। साफ पानी से भरा रहने वाला यह तालाब आसपास के लोगों के लिए छठ व्रत करने का मुख्य स्थान है। लेकिन अब विभिन्न त्योहारों के अवसर पर मूर्तियों के विसर्जन व आसपास के लोगों द्वारा कचरा फेंके जाने से गंदा हो गया है। अब गंदगी व दुर्गंध से इसका पानी उपयोग लायक नहीं बचा है। स्थानीय निवासी शंकर सिंह कहते हैं कि आस-पास के लोग इसमें घरों का कूड़ा-कचरा फेंकते हैं। अंधे विकास ने छीन ली तालाबों की खूबसूरती :

कभी जिले की रमणीयता को चार चांद लगाने वाले तालाबों की खूबसूरती विकास की इस अंधी दौड़ की भेंट चढ़ गई है। जिले की जीवन रेखा समझे जाने वाले तालाब आज स्थानीय लोगों द्वारा ही पाट दिए गए हैं। जो कभी सालों भर पानी से इतने भरे रहते थे कि उनमें डूबकर तलहटी से मिट्टी निकलना टेढ़ी खीर समझा जाता था, उन्हें पार करने का साहस किसी में नहीं था। इन तालाबों से जुड़ी कई किवदंतियां भी प्रचलित थीं। लेकिन यह सब बीते दिनों की बात बनकर रह गई है।

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