नारायण का स्वरूप है नर : सुरेश्वरानंद पुरी
निज प्रतिनिधि, शिवसागर (रोहतास) : नर ही नारायण है। नर की सेवा नारायण सेवा के स्वरूप होनी चाहिए। अद्वैत स्वरूप सन्यास आश्रम रायपुर चोर में चल रहे भागवत यज्ञ में परम सेवा ट्रस्ट के माध्यम से सैकड़ों लोगों के बीच वस्त्र व भोजन का वितरण करते हुए पंचकुला से आए संत स्वामी सुरेश्वरानंद पुरी जी ने नर को नारायण स्वरूप मानते हुए सेवा करने का उपदेश दिया।
स्वामी जी ने कहा कि भागवत कथा का उद्ेश्य पाप, श्राप, ताप एवं दुर्गति का निवारण करना है। सूर्यवंश के अनेक राजाओं का वृतांत सुनाते हुए कहा कि कर्तव्य पालन से पीछे मनुष्य को नहीं हटना चाहिए। गंगा अवतार से संसार में सर्वाधिक पवित्रता का संदेश मिलता है। कहा कि गंगा की वर्तमान स्थिति से हम सभी अतिशय दुखी हैं। मनुष्य जब तक प्रभु कृष्ण के आदर्शो को आत्मसात नहीं करेगा तब तक उनकी महिमा से दूरी बनी रहेगी। कहा कि कृष्ण की लीलाओं का आत्मिक आनंद की अनुभूति ही भगवत प्राप्ति का साधन है। उन्होंने जीवन में अनवरत संतों के सानिध्य में रहने एवं संयम का पालन करने का उपदेश दिया। अच्छे आचरण व सद्विचार से मनुष्य का जीवन सुव्यवस्थित रहता है। एक कथा के माध्यम से नारायण मनुष्य के किस स्थिति में आएंगे इसका वर्णन किया। कहा कि कोई नहीं जानता नारायण कहां और किस स्वरूप में हैं। इसीलिए नर की सेवा को महत्व दिया गया है। इस अवसर पर सुदूर पर्वतीय क्षेत्र चपरा, भावना, अहिरौली, पकड़िया, मगरपुरा, महुआ पोखर, बसनारा, योगिया सहित अन्य गांव से आए सैकड़ों गरीब लोगों के बीच वस्त्र वितरण कर उन्हें भोजन आदि कराया।
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