पटना [कुमार रजत]। प्रख्‍यात गणितज्ञ वशिष्‍ठ नारायण सिंह नहीं रहे। गणित का यह 'हीरा' गुरुवार की सुबह चला गया। जिन्होंने आइआइटी से लेकर अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय तक बिहार का नाम रोशन किया, आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत को चुनौती दी, उन्हें 'बिहार रत्न' सम्मान तक नहीं मिल सका। स्‍वजनों को इसका मलाल है।

भाई को मलाल: जिंदा रहते नहीं मिला कोई सम्मान

बीते महीने अक्टूबर में जब वशिष्ठ बाबू बीमार पड़े तो तभी स्‍वजनों ने इच्छा जताई थी कि उनके जीवनकाल में सम्मान मिल जाता, तो अच्छा लगता। उनके छोटे भाई अयोध्या सिंह ने कहा था- वशिष्ठ बाबू का इतना नाम है। पटना विश्वविद्यालय से लेकर अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय तक चर्चा में रहे। आइआइटी में पढ़ाया। गणित की थ्योरी को लेकर दुनिया भर में चर्चा में रहे मगर बिहार के लाल को यहां के लोग ही भूल चुके हैं। आज तक एक भी सम्मान नहीं मिला। बिहार रत्न तक देना किसी ने जरूरी नहीं समझा। इस बार पद्मश्री के लिए कई संस्थाओं ने नाम प्रस्तावित किया है। जिंदा रहते सम्मान मिल जाता तो अच्छा लगता।

बांसुरी बजाते और कलम से दीवारों पर खींचते थे लकीरें

वशिष्ठ बाबू सिजोफ्रेनिया बीमारी से ग्रसित थे। सब कुछ भूलने के बाद भी गणित से उनका लगाव दिखता था। हमेशा हाथों में कलम लिए रहते। डायरी पर लिखते। डायरी भर जाती तो दीवारों पर लकीरें खींचने लगते। इससे मन भर जाता तो बांसुरी बजाने लगते। बांसुरी उनको बहुत प्रिय थी।

अक्टूबर में पड़े थे बीमार, पीएमसीएच में हुआ था इलाज

अक्टूबर के पहले सप्ताह में वशिष्ठ बाबू की तबीयत बिगड़ी थी। वे पटना के अशोक राजपथ स्थित अपार्टमेंट में ही चक्कर खाकर गिर पड़े थे। आनन-फानन में पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्‍पताल (पीएमसीएच) में भर्ती कराया गया। लगभग एक सप्ताह तक भर्ती रहे मगर कोई मंत्री-विधायक मिलने नहीं पहुंचा था।

दवाओं के सेवन से किडनी पर पड़ा असर

राकेश कुमार बताते हैं कि तब पीएमसीएच में डॉक्टरों ने बताया कि सोडियम और पोटैशियम कम होने से वशिष्ठ बाबू को चक्कर आ गया था। कुछ जांच भी कराई गई। एक किडनी पर दवाओं के अत्यधिक सेवन का असर पडऩे की बात डॉक्टरों ने कही। एमआरआइ जांच भी कराई गई, जिसमें सिर के अंदरूनी भाग में गांठ की तरह हल्की चोट का भी पता चला।

नेतरहाट के पूर्ववर्ती छात्र करते रहे मदद

अयोध्या सिंह कहते हैं, वशिष्ठ बाबू को सबसे ज्यादा सहयोग नेतरहाट ओल्ड ब्वॉयज एसोसिएशन (नोबा) के सदस्यों ने की। पटना में रहने और इलाज का सारा खर्च पूर्ववर्ती छात्र ही उठाते थे, इसमें उनके कई सहपाठी भी हैं। वे जब भी मिलने आते, वशिष्ठ बाबू चहककर मिलते थे।

Posted By: Amit Alok

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