पटना। उत्तरप्रद्रेश जिले के आजमगढ़ के पंदाहा गांव में अपने नाना के घर नौ अप्रैल 1893 को जन्मे राहुल सांकृत्यायन का बचपन का नाम केदारनाथ था। वे बचपन से ही धर्म और आध्यात्म के प्रति रुचि होने के साथ धार्मिक आंडबर का विरोध करते रहे। कम उम्र में शादी और मां कुलवंती देवी के निधन ने सांकृत्यायन के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला। वर्ष 1910 के बाद उनके मन में घुमक्कड़ी रच बस गई। अपने जीवन काल में उन्होंने कई देशों की यात्राएं कीं। महापंडित की उपाधि धारण करने वाले यायावर राहुल पर बौद्ध धर्म का भी गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने वर्ष 1929 से 1939 तक चार बार तिब्बत की यात्रा की। इन यात्राओं के दौरान वे तिब्बती लिपि में लिखीं 10 हजार पांडुलिपियां अपने साथ खच्चर पर लादकर पटना लाए। इन्हें 'बिहार रिसर्च सोसाइटी' में सुरक्षित रखा गया है। राहुल तिब्बत यात्रा के दौरान वहां मौजूद संस्कृत ग्रंथों के 'फिल्म निगेटिव', 'ग्लास निगेटिव' के साथ ही बौद्ध मठों में तालपत्र पर लिखीं पांडुलिपियों की तस्वीर भी खींचकर लाये थे।

: पांडुलिपियों का सोसाइटी ने किया संग्रह :

'बिहार रिसर्च सोसाइटी' के प्रभारी शिवकुमार मिश्र के अनुसार काशी प्रसाद जायसवाल ने सोसाइटी की स्थापना 1915 में की थी। जायसवाल शोध कार्य करने वाले लोगों को अपना मानते थे। राहुल सांकृत्यायन के काशी प्रसाद जायसवाल से मधुर संबंध रहे। काशी प्रसाद जायसवाल आर्थिक रूप से राहुल सांकृत्यायन की मदद करते थे। तिब्बत से लाई गई पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने के साथ ही उनके डिजिटाइजेशन का कार्य बिहार रिसर्च सोसाइटी ने किया है।

: सोसाइटी में सुरक्षित पांडुलिपियां :

राहुल सांकृत्यायन द्वारा तिब्बत से लाई गई पांडुलिपियों में 'शतसाहस्त्रिका प्रज्ञा पारमिता', 'सुवर्ण प्रभाष' ग्रंथ शामिल हैं। ये तिब्बती लिपि और संस्कृत भाषा में हैं। इन्हें बुद्ध का वचन भी कहा जाता है। इसे रिसर्च सोसाइटी में रखा गया है। यह ग्रंथ हैंडमेड पेपर पर हस्तनिर्मित सोने व चांदी के चूर्ण को स्याही के साथ मिलाकर लिखा गया है। यह अपने आप में दुर्लभ ग्रंथ है। वहीं संस्कृत ग्रंथ 'प्रभाष वार्तिक भास्य' का प्रकाशन जापान की संस्था ने 1998 में किया है। इस ग्रंथ की भाषा संस्कृत एवं लिपि मिथिलाक्षर है। कई पांडुलिपियों में अनेक ग्रंथों का संपादन काशी प्रसाद जायसवाल, राहुल सांकृत्यायन द्वारा किया गया तथा प्रकाशन रिसर्च सोसाइटी की ओर से किया गया। वर्ष 2009 में बिहार रिसर्च सोसाइटी का अधिग्रहण कला संस्कृति विभाग द्वारा किया गया। इसके बाद पांडुलिपियों के डिजटाइजेशन काम वर्ष 2015-16 से आरंभ हुआ। जिसमें तिब्बती ग्रंथों का अनुवाद व प्रकाशन का दायित्व भारत सरकार की संस्था तिब्बती अध्ययन संस्थान सारनाथ को सौंपा गया है। तिब्बती ग्रंथों का अनुवाद हिदी में भी सारानाथ के दर्जनों विद्वान लोग करने में लगे हैं।

: किसान आंदोलनों से भी सांकृत्यायन का रहा जुड़ाव :

राहुल का जुड़ाव न केवल साहित्य व घुमक्कड़ी के साथ आंदोलनों से भी रहा। पटना विवि के पूर्व प्राध्यापक व बिहार विधान परिषद के सदस्य डॉ. रामवचन राय की मानें तो स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किसान आंदोलन का जिम्मा उत्तर बिहार में राहुल सांकृत्यायन के साथ रामवृक्ष बेनीपुरी को भी दिया गया था। किसान आंदोलन के दौरान गांव-गांव में राहुल सांकृत्यायन को 'राहुल बाबा' कहकर बड़े आदर से बुलाया जाता था। वहां जहां भी पहुंचते आंदोलन उग्र हो जाता था। 11 जनवरी 1922 को छपरा जिला कांग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान राहुल सांकृत्यायन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। वे बक्सर जेल में काफी दिनों तक रहे। अंग्रेजों की भी नजर उनपर रहती थी। 1923 में हजारीबाग जेल में उन्हें भेजा गया। जेल प्रवास के दौरान 'बाईसवीं सदी' नामक पुस्तक की रचना की।

Indian T20 League

शॉर्ट मे जानें सभी बड़ी खबरें और पायें ई-पेपर,ऑडियो न्यूज़,और अन्य सर्विस, डाउनलोड जागरण ऐप

kumbh-mela-2021