मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर पटना हाईकोर्ट में लोकहित याचिका
मतदाता सूची के पुनरीक्षण हेतु आयोग द्वारा निर्धारित शर्तें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5 6 19 325 एवं 326 के प्रतिकूल हैं। साथ ही यह तर्क दिया गया है कि चुनाव आयोग को नागरिकता की जांच करने का अधिकार नहीं है।याचिकाकर्ताओं की मांग है कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई इस प्रक्रिया पर तत्क्षण रोक लगाई जाए।

विधि संवाददाता,पटना। भारतीय चुनाव आयोग द्वारा जारी मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को असंवैधानिक बताते हुए पटना हाईकोर्ट में एक लोकहित याचिका दायर की गई है। याचिका सत्यनारायण मदन एवं अन्य द्वारा वरीय अधिवक्ता बसंत कुमार चौधरी के माध्यम से दायर की गई है।
याचिका में यह दावा किया गया है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण हेतु आयोग द्वारा निर्धारित शर्तें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5, 6, 19, 325 एवं 326 के प्रतिकूल हैं। साथ ही यह तर्क दिया गया है कि चुनाव आयोग को नागरिकता की जांच करने का अधिकार नहीं है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जो व्यक्ति एक बार जन्म अथवा निवास के आधार पर वैध मतदाता के रूप में पंजीकृत हो चुके हैं, उनके नामों को इस प्रकार की जांच के आधार पर मतदाता सूची से हटाया जाना न केवल अनुचित है, बल्कि यह अधिकार आयोग के अधिकार क्षेत्र से भी बाहर है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि मतदाता बनाए जाने के लिए आयोग द्वारा जो सीमाएं तय की गई हैं, वे मनमानी हैं और उनके तहत किया गया वर्गीकरण संविधान सम्मत नहीं कहा जा सकता। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई इस प्रक्रिया पर तत्क्षण रोक लगाई जाए।
बिहार म्युनिसिपल सेवा के 126 अधिकारियों के तबादले को हाईकोर्ट में चुनौती
बिहार म्युनिसिपल सेवा से जुड़े 126 अधिकारियों के बड़े पैमाने पर किए गए तबादलों को लेकर पटना हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। यह याचिका बिहार लोकल बॉडीज एम्प्लॉय फेडरेशन के मंत्री मोहम्मद असजद आलम उर्फ अप्पू की ओर से दायर की गई है, जिसमें राज्य सरकार द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश को नियम विरुद्ध एवं असंवैधानिक बताया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि दिनांक 30 जून 2025 को बिहार सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर म्युनिसिपल एवं बिहार प्रशासनिक सेवा से संबंधित अधिकारियों का स्थानांतरण कर दिया, जबकि यह आदेश सेवा नियमों एवं चुनाव आयोग के स्पष्ट दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है।
याचिका में यह तर्क दिया गया है कि वर्ष 2014 में राज्य सरकार ने एक परिपत्र जारी कर यह स्पष्ट किया था कि किसी भी अधिकारी का स्थानांतरण न्यूनतम तीन वर्ष की सेवा अवधि पूर्ण होने के बाद ही किया जाएगा। परंतु, कई अधिकारियों का कार्यकाल तीन वर्ष से पहले ही समाप्त कर मनमाने ढंग से उनका तबादला कर दिया गया।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि इन अधिकारियों को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी विशेष मतदाता पुनरीक्षण कार्यक्रम के तहत विभिन्न जिलों में इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर एवं असिस्टेंट इलेक्टोरल ऑफिसर के रूप में नामित किया गया था। इनकी जिम्मेदारी थी कि वे वैध मतदाताओं का नाम सूची में शामिल करें और फर्जी नामों की पहचान कर उन्हें हटाएं।
बीएलओ समेत अन्य निर्वाचनकर्मी भी आयोग के निर्देशानुसार विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में मतदाता सूची की जांच में लगे हुए हैं। ऐसे में इस महत्वपूर्ण कार्य के दौरान इतने बड़े पैमाने पर स्थानांतरण आदेश जारी करना चुनाव आयोग के कार्य में बाधा उत्पन्न करने के समान है। याचिका में यह आग्रह किया गया है कि राज्य सरकार के इस आदेश पर तत्काल रोक लगाई जाए।
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