'शादी का सबूत कहां है?' पटना हाई कोर्ट ने 20 साल पुराने दहेज केस में पलटा फैसला, आरोपी की 5 साल की सजा रद
पटना हाई कोर्ट ने करीब दो दशक पुराने दहेज उत्पीड़न मामले में ट्रायल कोर्ट से मिली पांच वर्ष की सजा ...और पढ़ें

दहेज उत्पीड़न मामले में पटना हाई कोर्ट ने अभियुक्त को किया बरी, दो दशक पुरानी सजा रद (AI Generated Image)
HighLights
पटना हाई कोर्ट ने दो दशक पुराने दहेज उत्पीड़न मामले में बरी किया।
अभियुक्त विशाल सिंह उर्फ नीरज सिंह को संदेह का लाभ दिया गया।
विवाह के ठोस दस्तावेजी साक्ष्य के अभाव में सजा रद्द हुई।
विधि संवाददाता, पटना। पटना हाई कोर्ट ने करीब दो दशक पुराने उत्पीड़न के मामले में ट्रायल कोर्ट से मिली पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा को रद करते हुए अभियुक्त विशाल सिंह उर्फ नीरज सिंह को बरी कर दिया।
न्यायालय ने कहा कि अभियोजन के मामले में विवाह के संबंध में ठोस दस्तावेजी साक्ष्य का अभाव है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियुक्त को संदेह का लाभ दिया जा सकता है। न्यायाधीश प्रभात कुमार सिंह की एकलपीठ ने विशाल सिंह उर्फ नीरज सिंह की अपील पर यह फैसला सुनाया।
अपीलार्थी को एडीजे-II-सह-विशेष न्यायाधीश, पटना की अदालत ने सत्र वाद संख्या 943/2007 में धारा 498ए आईपीसी तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत दोषी ठहराते हुए पांच वर्ष के कठोर कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट ने छह सितंबर 2018 के दोषसिद्धि आदेश और 13 सितंबर 2018 के सजा आदेश को निरस्त कर दिया।
मामले में अपीलार्थी की ओर से अधिवक्ता सुमीत कुमार सिंह के साथ अधिवक्ता कुमार विक्रम और विवेक कुमार ने पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने अभियोजन द्वारा बताए गए विवाह पर विशेष रूप से सवाल उठाया।
अभियोजन के अनुसार 27 अप्रैल 2005 को सोनपुर स्थित हरिहरनाथ मंदिर में विवाह हुआ था। बचाव पक्ष की ओर से सूचना के अधिकार के तहत मंदिर प्रबंधन से प्राप्त जानकारी को भी न्यायालय के समक्ष रखा गया।
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन का मामला मुख्य रूप से पीड़िता-सह-सूचक के बयान पर आधारित है, जबकि एक अन्य गवाह पक्षद्रोही हो गया। कोई अन्य स्वतंत्र गवाह प्रस्तुत नहीं किया गया और जांच अधिकारी का भी न्यायालय में परीक्षण नहीं कराया गया। विवाह के समर्थन में कोई दस्तावेजी साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया।
अदालत ने इन परिस्थितियों को अभियोजन के मामले पर गंभीर संदेह उत्पन्न करने वाला माना और अपीलार्थी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
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