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पटना में घुट रही लोगों की सांसे! निर्माण कार्यों की लापरवाही से धूल का गुबार, नियमों की उड़ रही धज्जियां

Published: Thu, 09 Apr 2026 07:56 AM (IST)

पटना में निर्माण कार्यों में लापरवाही से धूल प्रदूषण गंभीर समस्या बन गया है, जिससे हवा की गुणवत्ता लगातार गिर ...और पढ़ें

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जागरण संवाददाता, पटना। राजधानी पटना इन दिनों धूल की गंभीर समस्या से जूझ रही है। शहर के विभिन्न हिस्सों में चल रहे निर्माण कार्यों के दौरान निर्धारित पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं होने से हवा में धूल कणों का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। इसका सीधा असर आम लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो वायु प्रदूषण से स्थिति गंभीर हो सकती है। शहर में सड़क, नाला, भवन और अन्य आधारभूत संरचना से जुड़ी परियोजनाएं एक साथ चल रही हैं। इन निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के लिए तय नियम जैसे ग्रीन नेट लगाना, नियमित पानी का छिड़काव, मलबे को ढंककर रखना का पालन अधिकांश जगहों पर नहीं हो रहा है।

नतीजतन, तेज हवा के साथ धूल के गुबार आसपास के इलाकों में फैल रहे हैं। बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी निर्माण स्थल पर धूल उड़ने से रोकने के लिए पर्याप्त इंतजाम करना अनिवार्य है। इसके बावजूद जिम्मेदार एजेंसियां इन नियमों को नजरअंदाज कर रही हैं।

तय समय सीमा में पूरा नहीं हो रहा काम

निर्माण कार्यों में देरी भी प्रदूषण बढ़ाने का एक बड़ा कारण बन रही है। लंबे समय तक खुले पड़े निर्माण स्थल धूल के स्थायी स्रोत बन जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, शहर के कई प्रमुख मार्गों पर नाला और सड़क निर्माण कार्य महीनों से अधूरे पड़े हैं।

इससे न केवल यातायात प्रभावित हो रहा है, बल्कि आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों को लगातार धूल का सामना करना पड़ रहा है। पाटलिपुत्र औद्योगिक क्षेत्र व राजीव नगर क्षेत्र का यही हाल है।

सिर्फ रिहायशी इलाकों में पानी का छिड़काव

नगर निगम द्वारा धूल नियंत्रण के लिए पानी का छिड़काव किया जा रहा है, लेकिन यह प्रयास भी सीमित और असंतुलित है। अधिकतर छिड़काव केवल रिहायशी इलाकों में ही किया जा रहा है, जबकि मुख्य सड़कों, निर्माण स्थलों और व्यस्त चौराहों पर यह व्यवस्था न के बराबर है।

विधूल नियंत्रण के लिए पूरे शहर में समान रूप से और नियमित अंतराल पर पानी का छिड़काव जरूरी है। केवल चुनिंदा इलाकों में छिड़काव करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

फेफड़ा रोग विशेषज्ञ सह एचओडी, आइजीआइएमएस डा. मनीष शंकर ने बताया कि हवा में मौजूद महीन धूल कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंचकर सांस की बीमारियां, एलर्जी, अस्थमा और हृदय रोगों का खतरा बढ़ाते हैं। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए यह स्थिति अधिक खतरनाक है।

एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी

वायु प्रदूषण को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कई योजनाएं और निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका असर सीमित नजर आता है। नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और निर्माण एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी भी समस्या को बढ़ा रही है। नियमों के उल्लंघन के बावजूद जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती।

बहु-स्तरीय रणनीति अपनाने की जरूरत

पर्यावरण के क्षेत्र में राजकीय पुरस्कार से सम्मानित, पटना कॉलेजिएट स्कूल के वरिष्ठ शिक्षक डॉ. जयनारायण दुबे ने बताया कि धूल को नियंत्रित करने के लिए बहु-स्तरीय रणनीति अपनानी होगी। इसमें निर्माण स्थलों की नियमित निगरानी, नियमों का सख्ती से पालन, और उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कार्रवाई शामिल है।

इसके अलावा, सड़कों की नियमित सफाई, मशीनीकृत रोड स्वीपिंग, हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) का विकास और ट्रैफिक प्रबंधन भी जरूरी है। विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि शहर में रियल-टाइम एयर क्वालिटी निगरानी सिस्टम को और मजबूत किया जाए।

ये हैं नियम

  • निर्माण स्थल को चारों ओर से कवर करना अनिवार्य।
  • मलबे को ढंककर रखना और निर्धारित स्थान पर ही डंप करना।
  • नियमित पानी का छिड़काव।
  • निर्माण सामग्री के परिवहन के दौरान ढंककर ले जाना।
  • सड़क पर गिरी मिट्टी और मलबे की तुरंत सफाई।

समाधान की दिशा में जरूरी कदम

  • नियम तोड़ने वाले ठेकेदारों पर भारी जुर्माना लगाया जाए।
  • निर्माण कार्यों को तय समय सीमा में पूरा किया जाए।
  • केवल रिहायशी नहीं, बल्कि सभी प्रमुख सड़कों और निर्माण स्थलों पर नियमित छिड़काव हो।
  • लोगों को भी धूल नियंत्रण के प्रति जागरूक किया जाए।
  • मशीनीकृत सफाई और एंटी-स्मॉग गन का इस्तेमाल बढ़ाया जाए।

वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए 30.39 करोड़ खर्च कर रहा नगर निगम

राजधानी की हवा को शुद्ध बनाने व धूलकणों से मुक्ति दिलाने के लिए नगर निगम वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए 15वें वित्त आयोग के तहत प्राप्त 30.39 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है।

इसी वर्ष स्वीकृति के बाद इस राशि के उपयोग के लिए पांच मुख्य क्षेत्रों को चिह्नित किया गया। मुख्य रूप से शहर की सड़कों को धूल मुक्त करना, हरियाली बढ़ाना व श्मशान घाटों से निकलने वाले धुएं को नियंत्रित किया जाएगा।

इन पांच प्वाइंट में समझें कहां खर्च होंगे 30.39 करोड़

  • 12 करोड़: चार लेन सड़कों पर मशीनों से रोजाना डस्ट रिमूवल और भुगतान के लिए।
  • 10 करोड़: गंगा किनारे व गांधी मैदान में मियावाकी तकनीक से सघन पौधारोपण।
  • 05 करोड़: मुख्य सड़कों के किनारे कच्ची जमीन पर पेवर ब्लाक ताकि धूल न उड़े।
  • 03 करोड़: शवदाह के धुएं को साफ करने के लिए प्रदूषण नियंत्रण यंत्रों की स्थापना।
  • 39 लाख: निर्माण एवं विध्वंस कचरे के पुन: उपयोग और प्लांट के सुधार के लिए।

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