National Startup Day 2025: जिया हो बिहार के लाला.. पढ़ाई-नौकरी करते हुए जली दिमाग की बत्ती, फिर बना ली अपनी कंपनी
Bihar News राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस 2025 भारत में स्टार्टअप इकोसिस्टम को बढ़ावा देने और नए उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है। यह दिवस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत की दृष्टि को प्राप्त करने में स्टार्टअप्स की भूमिका को पहचानने के लिए मनाया जाता है। स्टार्टअप को बढ़ावा देने में बिहार के भी कई दिग्गज मैदान में उतरे हुए हैं।

विद्या सागर, पटना। Bihar News: व्यावसायिक जगत में ठीक ही कहा जाता है कि केवल पैसे से हीं नहीं, नए सोच, नए आइडिया से कोई व्यवसाय सफल होता है। आज राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस पर जानें ऐसे छह युवाओं की सफलता की कहानी, जो ना केवल प्रेरक हैं, बल्कि उन युवाओं के लिए भी संबल है, जो नौकरी या नामांकन के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल होने पर निराश हो जाते हैं।
इनमें तीन तो प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए राज्य के अलग-अलग जिलों से पटना में किराए का कमरा लेकर रह रहे थे। वहीं, दो सरकारी व निजी क्षेत्र में नौकरी कर रहे थे। इन पांचों ने सेवा क्षेत्र का स्टार्टअप का माध्यम बनाया और सफल हो गए।
प्रख्यात कश्यप की सफलता की कहानी
समस्तीपुर जिले के भदैया के मध्यवर्गीय किसान परिवार के प्रख्यात कश्यप वर्ष 2012 में पढ़ाई करने पटना आए थे। एमकाम कर चुके थे, उसी वर्ष 16 जनवरी 2016 को राष्ट्रीय स्तर पर स्टार्टअप इंडिया प्रोग्राम लांच हुआ तो कुछ अपना करने का मन बनाया। अपने स्टार्टअप का नाम रखा ‘आदमी वाला’।
काम था कंपनियों की आवश्यकता के अनुसार योग्य प्रोफेशनल्स उपलब्ध कराना। शुरुआत में कई लोगों से मिले, कहीं से कोई मांग नहीं हुई तो निराश नहीं हुए। लगातार लगे रहे, एक-दो कंपनियों को मैन पावर सप्लाई किया। वर्ष 2018 में अगल-अगल स्टार्टअप चला रहे दो मित्रों को साथ लिया।
स्टार्टअप के हीरो प्रख्यात
फिर बनी राहुल, आलोक और प्रख्यात की तिकड़ी
राहुल मुजफ्फरपुर व आलोक पटना के हैं। तीनों बाजार की जरूरत भांप चुके थे, इस कारण तीनों ने मिलकर 2018 में ही नया स्टार्टअप शुरू किया, नाम रखा ‘को वर्किंग स्टूडियो’। ये लोग विभिन्न कंपनियों को पटना में उनकी आवश्यकता के अनुसार एक ही छत के नीचे कार्यालय उपलब्ध कराने लगे।
मीटिंग रूम, चैंबर, वर्किंग स्पेस, इंटरनेट, बिजली आदि मुहैया कराया। कर्मियों को अनुकूल माहौल मिले, इसका पूरा ख्याल रखा। कंकड़बाग में किराए पर लिए गए एक भवन से शुरू यह स्टार्टअप अब चल पड़ा है। आज आठ राज्यों में कोवर्किंग स्टूडियो का काम चल रहा है। पटना के साथ ही रांची, गुवाहाटी, विजयवाड़ा, कोलकाता, इंदौर, अगरतला व लखनऊ में इसकी शाखाएं हैं। पटना में ही पांच जगहों पर इनका स्टूडियो है।
प्रख्यात, राहुल और आलोक
20 लाख से शुरू किया था स्टार्टअप, 30 शहरों में विस्तार का लक्ष्य
प्रख्यात बताते हैं कि तीनों मित्रों ने मिलकर 20 लाख रुपये की पूंजी से यह स्टार्टअप शुरू किया था। शुरू में सात कर्मी रखे। आज 145 लोगों को रोजगार दिया है। 10 करोड़ रुपये का टर्नओवर है। 250 से अधिक कपंनियों के कर्मचारी उनके स्टूडियो में काम कर रहे हैं। बिहार सरकार की स्टार्टअप नीति से भी लाभ मिला।
पाटलिपुत्र में स्थित कोवर्किंग स्टूडियो में एक छत के नीचे काम कर रहे कई कंपनियों के कर्मी
निकट भविष्य में देश के 30 शहरों में स्टूडियो शुरू करने की योजना है। बिहार के स्टार्टअप के पूंजी बाजार में नहीं आने के सवाल पर प्रख्यात ने बताया कि बिहार में बहुत अच्छी स्टार्टअप कंपनियां हैं। आने वाले समय में आपको शेयर बाजार में भी ये नजर आ आएंगी।
पटना के कंकड़बाग स्थित कोवर्किंग स्टूडियो
100 छात्रों को स्टार्टअप के लिए दक्ष बना रहे
ये भोजपुर जिले के गीधा निवासी धीरज कुमार हैं। स्टार्टअप हब (MeitY) में, इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत, मेंटर के रूप में काम कर रहे थे, तब उन्होंने देखा कि युवा एंटरप्रेन्योरशिप की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। उनके पास बड़े सपने हैं, लेकिन सही दिशा और मार्गदर्शन की कमी है। विशेषकर बिहार में इसकी अत्यधिक कमी थी।
उन्होंने युवाओं को सही दिशा, कार्य आधारित ज्ञान देने का निर्णय किया। जनवरी 2024 में अपने स्टार्टअप इंस्टीट्यूट आफ फाउंडर्स की बुनियाद रखी। धीरज एमसीए के बाद बीआइटी मेसरा से पीएचडी कर रहे हैं।
आज उनका यह केंद्र केवल लर्निंग सेंटर नहीं, बल्कि यह एक स्टार्टअप कैटालिस्ट है, जो एंटरप्रेन्योरशिप को तेजी से बढ़ावा देता है। यहां भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम के बड़े नाम छात्रों का समय-समय पर मार्गदर्शन करते हैं।
इंस्टीट्यूट ऑफ फाउंडर्स के फाउंडर धीरज कुमार
यहां अब तक 100 छात्रों ने नामांकन लिया है। इन्हें पर्सनलाइज्ड मेंटारशिप, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग और असली दुनिया की प्रतिस्पर्धा से जूझकर सफल होने के तौर-तरीके बताए जाते हैं, ताकि वे स्टार्टअप की जटिलताओं को समझ सकें।
धीरज कहते हैं कि हैंड्स-आन लर्निंग एक्सपीरियंस सबसे प्रभावी होता है, जहां छात्र मेंटर्स के साथ काम करके स्किल्स और आत्मविश्वास दोनों विकसित करते हैं।
वेंडर्स और कंपनियों के बीच की कड़ी बनीं पटना के मध्यवर्गीय परिवार की विशाखा सिंह
आईएचएम से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर एक बड़े होटल में नौकरी कर रहीं थीं। नौकरी के दौरान वेंडर मैनेजमेंट टीम को कई तरह की चुनौतियों का सामना करते हुए देखा तो उन्हें वेंडर्स व कंपनियों के बीच की कड़ी बनने का आइडिया आया।
नौकरी छोड़ दी और वर्ष 2024 में कोविनडेएक्स नामक स्टार्टअप शुरू कर दिया। सुसज्जित कार्यालय व अन्य संसाधन पर पांच लाख रुपये खर्च किए। दो स्टाफ रखे। लक्ष्य एक प्रभावी, पारदर्शी और सुविधाजनक प्लेटफार्म का निर्माण था।
विशाखा सिंह ने कोविनडेएक्स नामक स्टार्टअप शुरू किया
आज वह अपने स्टार्टअप के माध्यम से कई वेंडर्स और फ्रीलांसर्स को उनके व्वसाय का विस्तार करने और नए क्लाइंट्स से जुड़ने का अवसर दे रही हैं। हर माह 10 लाख का टर्नओवर है। 32 लोगों को नौकरी पर रखा है। अब जाकर राज्य सरकार को मदद के लिए आवेदन किया है।
विशाखा बतातीं हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती वेबसाइट बनाना रहा, क्योंकि यह एक नए स्टार्टअप के लिए काफी महंगा हो जाता है। इसकी वजह से हम मार्केटिंग जैसी जरूरी चीजों में निवेश नहीं कर पाते।
उनकी सरकार से मांग है कि छोटे स्टार्टअप्स को शुरुआत में वेबसाइट बनाने और होस्टिंग में मदद दी जाए, जैसे आफिस स्पेस की सुविधा मिलती है। इससे तकनीक के युग में छोटे स्टार्टअप्स को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।
बड़े ब्रांड के बीच पर्सनलाइज्ड व डिजाइनर फुटवियर की धमक
पटना जिले के बाढ़ की रश्मि ने कोरोना के दौरान नौकरी छोड़ दी थी। चारों ओर निराशा का माहौल था, घर में बैठे-बैठे उनके मन में कुछ नया करने का विचार आया। निफ्ट (नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फैशन टेक्नोलाजी) से स्नातक कर चुकी थीं, इसी योग्यता का प्रयोग फुटवियर क्षेत्र में करने की ठानी। वर्ष 2022 में फुटवियर क्षेत्र में अपना स्टार्टअप शुरू कर दिया, नाम रखा धजक्राफ्ट। फुटवियर के नए-नए डिजाइन बनाने लगीं।
रश्मि ने आसपास के लोगों से ली राय
अपने आस-पास के लोगों से राय ली कि क्या वे इसे पहनना पसंद करेंगे। सकारात्मक प्रतिक्रिया से उत्साह बढ़ा। बिहार हस्तशिल्प के लिए प्रसिद्ध है और यहां के स्थानीय कारीगरों के पास रोजगार के सीमित अवसर हैं, इसलिए उन्हीं कारीगरों को जोड़कर काम करना शुरू किया।
वे डिजाइनर और पर्सनलाइज्ड फुटवियर बनाती हैं। अर्थात किसी व्यक्ति के पैरों के स्वास्थ व आवश्यकता के अनुरूप जूते व चप्पल बनाना। शुरुआत में प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम से 10 लाख रुपये ऋण लिया। आज उनकी टीम में 10 कारीगर हैं। ऋण की किश्त समय पर चुका रही हैं।
रश्मि ने फुटवियर स्टार्टअप बनाया
उनकी कंपनी बिहार स्टार्टअप और स्टार्टअप इंडिया से प्रमाणित है। रश्मि ने कहा कि सरकार से अपेक्षा है कि छोटे स्टार्टअप को मार्केटिंग का बड़ा प्लेटफार्म उपलब्ध कराए, ताकि वे अपने उत्पाद अधिक से अधिक ग्राहकों तक पहुंचा सकें। निर्यात और शिपिंग लागत को कम करने की दिशा में भी समर्थन दें क्योंकि शिपिंग चार्ज की वजह से उत्पाद की कीमत बढ़ जाती है।
यह भी जानें
- स्टार्टअप इंडिया का शुभारंभ : 16 जनवरी 2016
- बिहार में नई स्टार्टअप नीति का शुभारंभ: अगस्त 2022
- वर्ष 2024 तक बिहार में पंजीकृत स्टार्टअप: 815
- एसआइडीबीआइ (स्माल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक आफ इंडिया) से फंड को समझौता : 150 करोड़
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