जलती हुई मशाल लेकर घूमने की परंपरा, सूप पीटकर भगाते हैं दरिद्र; मिथिला में कैसे मनाई जाती है दीपावली?
Mithila Diwali Tradition: मिथिला में दीपों की रोशनी के साथ पितरों को विदाई देने के लिए उल्का भ्रमण की परंपरा ...और पढ़ें
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एआई से बनाई गई तस्वीर
HighLights
पितरों को विदाई देने के लिए उल्का भ्रमण की परंपरा।
महिलाएं सूप पीटकर दरिद्रता को घर से बाहर करती हैं।
कुलदेवता की पूजा और बच्चों का हुक्का-लोली उत्साह।
जागरण संवाददाता, पटना। दीपावली यानी दीपों का उत्सव। घर-आंगन में जगमगाते दीप, लक्ष्मी-गणेश की आराधना और सुख-समृद्धि की कामना देशभर में इस पर्व की पहचान है, लेकिन मिथिला में दीपावली (Mithila Diwali) का स्वरूप कुछ अलग और विशिष्ट है।
यहां दीपों की रोशनी के साथ पितरों को विदाई देने के लिए उल्का भ्रमण की परंपरा निभाई जाती है। अगली सुबह महिलाएं सूप पीटकर दरिद्र को घर से बाहर करने की लोकरीति (Sup Pitai Ritual) पूरी करती हैं।
कहीं कुलदेवता की पूजा होती है, तो कहीं बच्चे हुक्का-लोली और उक्का-पाती की परंपरा में उत्साह से शामिल होते हैं। मिथिला की धार्मिक आस्था, पूर्वजों के प्रति सम्मान और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना एक साथ दिखाई देती है।
गोसाईं घर में होती है पहली पूजा
पंडित राघव नाथ झा बताते हैं कि मिथिला में दीपावली (Mithila Deepawali) के अवसर पर सबसे पहले घर के गोसाईं घर यानी कुलदेवता के पूजास्थल में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार की परंपरा और पूर्वजों से जुड़े संस्कारों के स्मरण का अवसर भी है।
इसके बाद घर के मुख्य द्वार, आंगन, तुलसी चौरा और अन्य स्थानों पर दीप जलाए जाते हैं। मान्यता है कि दीपों की रोशनी से घर में सकारात्मकता और समृद्धि का आगमन होता है।
दीपावली की रात जलती मशाल लेकर क्यों निकलते हैं मिथिलावासी?
मिथिला की दीपावली की सबसे विशिष्ट परंपराओं में उल्का भ्रमण शामिल है। दीपावली की रात लोग जलती हुई उल्का लेकर भ्रमण करते हैं। लोक मान्यता के अनुसार, महालय और पितृपक्ष के दौरान धरती पर आए पितरों को प्रकाश के माध्यम से विदाई दी जाती है।
इस दौरान परंपरागत उल्का भ्रमण मंत्र का पाठ भी किया जाता है। इसके माध्यम से ज्ञात-अज्ञात पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए उनके मंगलमय प्रस्थान की कामना की जाती है।
इस परंपरा में दीपावली की रोशनी का संबंध केवल घर की खुशहाली से नहीं, बल्कि पितरों के प्रति कृतज्ञता और पारिवारिक स्मृतियों से भी जुड़ता है।
हुक्का-लोली में दिखता है बच्चों का उत्साह
दीपावली की रात बच्चों के लिए हुक्का-लोली की परंपरा भी खास आकर्षण रखती है। पुराने कपड़ों से बनाई गई जलती हुई गेंद या मशाल जैसी आकृति के साथ बच्चे इस लोक परंपरा को निभाते हैं।
यह मिथिला के ग्रामीण जीवन और सामूहिक उत्सवधर्मिता की सहज अभिव्यक्ति है। इसी तरह उक्का-पाती की परंपरा भी दीपावली के लोकाचारों से जुड़ी है। समय के साथ इन परंपराओं का स्वरूप भले बदल रहा हो, लेकिन इनके प्रति लोगों का सांस्कृतिक लगाव आज भी बना हुआ है।
सुबह महिलाएं सूप पीटकर क्यों भगाती हैं दरिद्रता?
दीपावली के अगले दिन सुबह महिलाओं द्वारा सूप पीटने की परंपरा निभाई जाती है। इसे दरिद्रता को घर से बाहर निकालने का प्रतीक माना जाता है। महिलाएं सूप बजाते हुए घर से बाहर निकलती हैं और लोक मान्यता के अनुसार दरिद्र को विदा कर सुख-समृद्धि के आगमन की कामना करती हैं।
यह परंपरा बताती है कि मिथिला में दीपावली का उत्सव केवल एक रात की पूजा और रोशनी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ कई पीढ़ियों से चली आ रही लोक मान्यताएं भी जुड़ी हैं।
मिथिला की ये परंपराएं बताती हैं कि दीपावली केवल दीप जलाने और घर सजाने का पर्व नहीं है। इसमें कुलदेवता की आराधना, पितरों के प्रति श्रद्धा, लोक जीवन की सहज अभिव्यक्ति और परिवार की मंगलकामना का सुंदर समन्वय है।
बदलते समय में इन परंपराओं को समझना, संजोना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने की जिम्मेदारी भी है।
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