बच्चों संग 12 साल से नहीं मनाई दीवाली, वर्दी के फर्ज के लिए निजी खुशियां कुर्बान; मुंगेर की इंस्पेक्टर की कहानी
मुंगेर की इंस्पेक्टर रूबी कांत कच्छप बीते 12 वर्षों से परिवार से दूर, ड्यूटी पर दिवाली मना रही हैं, शहर ...और पढ़ें

थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर रूबी कांत कच्छप। फोटो जागरण
HighLights
इंस्पेक्टर रूबी कांत कच्छप की 12वीं दिवाली ड्यूटी पर।
मुंगेर में परिवार से दूर रहकर निभा रहीं सुरक्षा की जिम्मेदारी।
जनता की खुशियों की पहरेदारी में मिलता है संतोष।
हैदर अली, मुंगेर। घर में जलते दीये, बच्चों की खिलखिलाहट और अपनों के साथ त्योहार मनाने की खुशी। दिवाली पर हर किसी की चाहत होती है कि वह परिवार के बीच रहकर खुशियां बांटे, लेकिन खाकी वर्दी पहनकर सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वालों की दिवाली दूसरों से अलग होती है।
जब शहर रोशनी से जगमगाता है, तब वे सड़कों पर मुस्तैद रहकर लोगों की खुशियों की पहरेदारी करते हैं। ऐसी ही कहानी बिहार के मुंगेर जिले के कासिम बाजार थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर रूबी कांत कच्छप की है, जिनकी बीते 12 वर्षों से दीपावली परिवार से दूर ड्यूटी में गुजर रही है।
मूलरूप से पूर्णिया की रहने वाली रूबी के परिवार में शिक्षक पति और दो बच्चे हैं। बच्चों के साथ दीप जलाने, मिठाइयां बांटने और त्योहार की खुशियां साझा करने की इच्छा हर बार होती है, लेकिन जिम्मेदारी के आगे उनकी व्यक्तिगत खुशियां पीछे रह जाती हैं। जब दूसरे परिवार पूजा और उत्सव में व्यस्त होते हैं, तब उन्हें सुरक्षा व्यवस्था की कमान संभालनी होती है।
किशनगंज से मुंगेर तक, त्योहारों पर वर्दी ही साथी
रूबी बताती हैं कि वर्ष 2010 में किशनगंज में पहली पोस्टिंग हुई थी। पहली तैनाती से ही दुर्गापूजा और दीपावली जैसे त्योहारों में ड्यूटी का सिलसिला शुरू हो गया। इसके बाद कटिहार, बेगूसराय, जमुई और लखीसराय में भी तैनाती रही।
हर जगह त्योहार आया, लेकिन परिवार के साथ रहने का अवसर नहीं मिला। मुंगेर में मुफस्सिल और संग्रामपुर थाना की जिम्मेदारी संभालने के बाद पिछले दो वर्षों से कासिम बाजार थानाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।
बच्चों की याद आती है, पर जिम्मेदारी सबसे पहले
रूबी कहती हैं कि बच्चों से दूर रहकर त्योहार मनाना आसान नहीं है। मां होने के नाते उनके साथ दीपावली मनाने और खुशियां बांटने का मन होता है, लेकिन शहर की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। वह कहती हैं, जहां ड्यूटी, वहीं हमारा परिवार है।
यही सोच उन्हें हर त्योहार पर मुस्तैद रहने की ताकत देती है। उनकी दिवाली भले ही घर के आंगन में न बीते, लेकिन उनकी ड्यूटी से सैकड़ों परिवार अपने घरों में सुरक्षित दीप जला पाते हैं। खाकी की यह जिम्मेदारी ही उनके लिए त्योहार का सबसे बड़ा संतोष है।
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