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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 06, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

क्या है साड़ी का इतिहास? क्यों पहनी जाती है साड़ी....जानिए

By Kajal KumariEdited By:
Published: Tue, 06 Sep 2016 08:47 PM (IST)Updated: Thu, 08 Sep 2016 10:27 PM (IST)

भारतीय महिलाओं की पहचान साड़ी आज विश्व में विख्यात है। पूरी दुनिया इसकी दीवानी है। पारंपरिक परिधान के रुप में ...और पढ़ें

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पटना [काजल]। साड़ी का नाम आते ही भारतीय नारी का पूरा व्यक्तित्व नजरों के सामने उभर आता है। साड़ी भारतीय स्त्री का मुख्य परिधान है। साड़ी जो आज विदेशों में भी खूब पसंद की जा रही है। भारत आईं विदेशी मेहमान भी साड़ी पहनकर भारतीयता का एहसास करती हैं।

साड़ी शायद विश्व की सबसे लंबी और पुराने परिधानों में से एक है। इसकी लंबाई सभी परिधानों से ज्यादा है और यह एक तरह से कहें तो आदिकाल से भारतीयता की पहचान भी है। यह लगभग 5 से 6 गज लम्बी होती है और यह ब्लाउज या चोली और पेटीकोट के साथ पहनी जाती है। वहीं महाराष्ट्र में नौ गज की साड़ी पहनने का रिवाज है।

साड़ी के इतिहास पर नजर डालें तो इसका उल्लेख वेदों में मिलता है। यजुर्वेद में सबसे पहले साड़ी शब्द का उल्लेख मिलता है। वहीं ऋग्वेद की संहिता के अनुसार यज्ञ या हवन के समय पत्नी को साड़ी पहनने का विधान है एेसा कहा गया है। धीरे-धीरे यह भारतीय परंपरा का हिस्सा बनती गई और आज भी साड़ी भारत की अपनी पहचान है।

पौराणिक ग्रंथ महाभारत में द्रौपदी के चीर हरण का प्रसंग है। जब क्रोध में आकर दुर्योधन ने द्यूत क्रीड़ा में द्रौपदी को जीतकर उसकी अस्मिता को सार्वजनिक चुनौती दी थी तब भगवान श्रीकृष्ण ने साड़ी की लंबाई बढ़ाकर उसकी रक्षा की थी। इससे यह पता चलता है कि साड़ी केवल पहनावा ही नहीं स्त्री के लिए आत्म कवच भी है।

पुरातन काल से चली आ रही पारंपरिक परिधान साड़ी आज तरह-तरह के रंगों डिजायनों में उपलब्ध है। वक्त के साथ इसमें बदलाव होते गए। दूसरी शताब्दी में पुरुषों और स्त्रियों के ऊपरी भाग को अनावृत दर्शाया गया है। इसमें बारहवीं शताब्दी तक कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ। चूंकि साड़ी का धर्म के साथ विशेष जुड़ाव रहा है, इसीलिए बहुत सारे धार्मिक परंपरागत कला का इसमें समावेश होता गया और रंग डिजाइन बदलते गए।

धर्म और रंग का सामाजिक प्रभाव भी साड़ी पर साफ देखा जा सकता है। जहां पहले सामाजिक रीति-रिवाज के अनुसार विवाहित महिलाएं रंगीन और डिजायनदार साड़ी पहनती थीं और विधवाओं को पहनने के लिए सफेद रंग की साड़ी दी जाती थी। उन्हें रंगहीन समझा जाता था। समय के साथ परंपराएं भी बदलीं हैं।

साड़ी पहनने के कई तरीके हैं जो भौगोलिक स्थिति और पारंपरिक मूल्यों और रुचियों पर निर्भर करते है। भारत में अलग-अलग शैली की साड़ियों में कांजीवरम साड़ी, बनारसी साड़ी, पटोला साड़ी और हकोबा मुख्य हैं। मध्य प्रदेश की चंदेरी, महेश्वरी, मधुबनी छपाई, असम की मूंगा रशम, उड़ीसा की बोमकई, राजस्थान की बंधेज, गुजरात की गठोडा, पटौला, बिहार की तसर, काथा, छत्तीसगढ़ी कोसा रशम, दिल्ली की रशमी साड़ियां, झारखंडी कोसा रशम, महाराष्ट्र की पैथानी, तमिलनाडु की कांजीवरम, बनारसी साड़ियां, उत्तर प्रदेश की तांची, जामदानी, जामवर एवं पश्चिम बंगाल की बालूछरी एवं कांथा टंगैल आदि प्रसिद्ध साड़ियाँ हैं।

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बनारसी साड़ी

बनारसी साड़ी एक विशेष प्रकार की साड़ी है जो शुभ अवसरों पर पहनी जाती है। यह मुख्यत उत्तरप्रदेश के चंदौली,बनारस, जौनपुर, आजमगढ़, मिर्जापुर और संत रविदासनगर जिले में बनाई जाती है। रेशम की साड़ियों पर बनारस में बुनाई के संग जरी के डिजायन मिलाकर बुनने से तैयार होने वाली सुंदर रेशमी साड़ी को बनारसी साड़ी कहा जाता है।

पहले बनारस की अर्थ व्यवस्था का मुख्य स्तंभ बनारसी साड़ी का काम था, पर अब इस साड़ी की अस्मिता खतरे में है। कभी इसमें शुद्ध सोने की जरी का उपयोग किया जाता था लेकिन अब नकली चमकदार जरी का काम भी किया जा रहा है।

महाराष्ट्रियन साड़ी

महाराष्ट्र में खास साड़ी पहनी जाती है जो नौ गज लंबी होती है, इसे पैठणी कहते हैं। यह पैठण शहर में बनती है इस साड़ी को बनाने की प्रेरणा अजन्ता की गुफा में की गई चित्रकारी से मिली थी। इससे पहनने का अपना पारंपरिक स्टाइल है जो महाराष्ट्र की औरतों को ही आता है।

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पटोला साड़ी

यह साड़ी मुख्यत हथकरघे से बनती है। पटोला साड़ी दोनों ओर से बनाई जाती है और इसमें बहुत ही बारीक काम किया जाता है। यह रेशम के धागों से बनाई जाती है। पटोला डिजायन और पटोला साड़ी भी अब लुप्त होने की कगार पर है। इसका कारण है कि इसके बुनकरों को लागत के हिसाब से कीमत नहीं मिल पाती।

महेश्वरी साड़ी

यह साड़ी मुख्यत मध्य प्रदेश में पहनी जाती है। पहले यह सूती साड़ी ही बनाई जाती थी लेकिन अब धीरे-धीरे रेशम की भी बनाई जाने लगी है। इसका इतिहास काफी पुराना है। होल्कर वंश की महान शासक देवी अहिल्याबाई ने ढाई सौ साल पहले गुजरात से लाकर महेश्वर में कुछ बुनकरों को बसाया था और उन्हें घर, व्यापार और अन्य सुविधाएं दी थींं। यही बुनकर महेश्वरी साड़ी तैयार करते थे।

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चंदेरी साड़ी

चंदेरी की विश्व प्रसिद्ध साड़ियां आज भी हथकरघे पर ही बुनी जाती हैं, यही इसकी विशेषता है। इन साड़ियों का अपना समृद्धशाली इतिहास रहा है। पहले ये साड़ियां केवल राजघराने में ही पहनी जाती थीं, लेकिन अब यह आम लोगों तक भी पहुंच चुकी हैं। एक चंदेरी साड़ी बनाने में एक बुनकर को सालभर का वक्त लगता है, इसीलिए चंदेरी साड़ियों को बनाते वक्त कारीगर इसे बाहरी नजरों से बचाने के लिए हर मीटर पर काजल का टीका लगाते हैं।

इनके अलावे भी भारत में तरह-तरह के रंगों-डिजायनोें में साड़ियां बनाई जाती हैं लेकिन इन साड़ियों की अपनी खास विशेषता है। अब तो मिल में साड़ियां बनती हैं जिनके डिजायन्स एक जैसे भी हो सकते हैं लेकिन अभी भी जो हस्तकरघे पर विशेष पारंपरिक साड़ियां तैयार की जाती हैं उनकी डिजायन दूसरी नहीं मिलती।