पटना [प्रमोद पांडेय]। बौद्ध प्रतीक चिह्नों में विशिष्ट महत्व वाला पूर्वी चंपारण जिले के केसरिया में अवस्थित बौद्ध स्तूप लंबे समय तक पहचान का संकट झेलता रहा। विभिन्न शोधों के आधार पर हुई खुदाई में जब यह स्पष्ट हो गया कि यह दुनिया का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप है तो पूरी दुनिया का इधर ध्यान गया।

तब लगा कि अब न केवल स्तूप क्षेत्र बल्कि पूरे इलाके का विकास हो जाएगा लेकिन थोड़े दिनों की तत्परता के बाद खुदाई का काम रूकते ही सब कुछ जैसे ठहर-सा गया है। न तो स्तूप की सुरक्षा को लेकर कोई सक्रियता दिखती है न इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण को लेकर।

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104 फीट ऊंचा है यह स्तूप

केसरिया स्तूप की ऊंचाई 104 फीट है। इसके साठ फीसद हिस्से की ही खुदाई हो पाई है। बाकी हिस्से अब भी खुदाई के इंतजार में है। अनुमान है कि स्तूप से लेकर दक्षिण दिशा में बहती गंडक नदी तक चौड़ी सड़क अब भी जमींदोज है। जो खुदाई हुई है उसके बारे में जानकारों का मानना है कि यह अपेक्षाकृत बेहद कम इलाके की हुई है। पूरे इलाके की खुदाई हो तो स्तूप के साथ कई ऐसी इमारतें भी प्रकाश में आएंगी जिनके बारे में किसी को पता नहीं है।

खंडित मूर्तियां विध्वंस का देती हैं प्रमाण

खुदाई में दीवारों पर खंडित बुद्धमूर्तियों के अवशेष दिल दहला देते हैं। ऐसा लगता है कि इन प्रस्तर मूर्तियों का ध्वंस किया गया हो। यह भी अनुमान है कि आक्रांताओं से बचाने के लिए ही इस स्तूप को छिपाने की कवायद हुई जिसके कारण यह लोगों के मानस पटल से विस्मृत होता चला गया। मध्य युग में विभिन्न ऐतिहासिक इमारतों को आक्रांताओं की नजरों से बचाने के लिए ऐसी कोशिश आम थी। इतिहासकार मानते हैं कि दिलवाड़े के ऐतिहासिक जैन मंदिर भी इसी प्रकार छिपाए गए थे।

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बुद्ध ने यहां लिच्छवियों को दे दिया था अपना भिक्षापात्र

गंडक नदी के किनारे अवस्थित केसरिया एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल है। इसका इतिहास काफी पुराना व समृद्ध है। बौद्ध आख्यानों के मुताबिक महापरिनिर्वाण के वक्त वैशाली से कुशीनगर जाते गौतम बुद्ध ने एक रात केसरिया में बिताई थी।

कहा जाता है कि यहां उन्होंने अपना भिक्षा-पात्र लिच्छवियों को दे दिया था। आख्यानों के मुताबिक जब भगवान बुद्ध यहां से जाने लगे तो लिच्छवियों ने उन्हें रोकने का काफी प्रयास किया। लिच्छवी नहीं माने तो भगवान बुद्ध ने नदी में कृत्रिम बाढ़ उत्पन्न कर उनका मार्ग अवरूद्ध कर दिया था। इस स्तूप का निर्माण सम्राट अशोक ने कराया था। कालांतर में यह ऐतिहासिक परिसर विस्मृति के गर्त में समा गया था।

1998 में शुरू हुई थी खुदाई

दशकों नहीं, सदियों तक इसकी पहचान देउर के रूप में रही और लोग इसे क्षेत्रीय राजा वेन के गढ़ की मान्यता देते थे। यह हिंदू देवताओं का आवास स्थल माना जाता था। जिला प्रशासन की पहल पर 1995 में इस जगह का दौरा कर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के लोगों ने इसे खुदाई के लिए चिह्नित किया था।

इसके बाद 1998 में इस ऐतिहासिक स्थल की खुदाई शुरू हुई तो इलाके में कभी समृद्ध रही बौद्ध परंपरा ने लोगों को ऐसी गौरवानुभूति दी कि पूरे इलाकेका सीना गर्व से चौड़ा हो गया। बाद में यह स्तूप दुनिया का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप माना गया और सांची स्तूप ऊंचाई के मामले में दूसरे नंबर पर आ गया।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कार्यालय ने इस जगह को अपने संरक्षण में ले लिया। खुदाई में तेजी आई तो वर्षों से जमींदोज इतिहास फिर से जीवंत हो उठा। कभी लोग दिन में इधर आने से डरते थे और इस स्थान के पर्यटक स्थल के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया शुरू हुई। देखते-देखते केसरिया न केवल बिहार बल्कि देश और विदेश के पर्यटक मानचित्र पर आ गया। विदेशी पर्यटक पहुंचने लगे। उम्मीदों को पंख लगे।

असुरक्षित है पूरा परिसर

इतना ऐतिसासिक महत्व और सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं। यह अविश्वसनीय परंतु सच है। बिहार पुलिस के चार जवान यहां दिन में ड्यूटी करते हैं पर रात में सुरक्षा का कोई प्रबंध यहां नहीं है। स्तूप की सीढिय़ों से पहले लोग शिखर तक जाते थे जिसे सुरक्षा कारणों से रोक दिया गया लेकिन इसके अतिरिक्त कोई और ऐसा उपाय नहीं हुआ है जिससे कि लगे कि इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण व संवद्र्धन के प्रयास हो रहे हों।

भूकंप जोन 5 में चिह्नित है पूरा इलाका

इस इमारत को सबसे अधिक खतरा बारिश और भूकंप से है। यह इलाका भूकंप के लिए चिह्नित जोन-5 का हिस्सा है जहां भूकंप की तीव्रता और खतरा सर्वाधिक माना गया है। पिछले साल भूकंप में इस ऐतिहासिक स्तूप की सबसे ऊंचाई पर लगी ईंटों के खिसकने की चर्चा थी लेकिन पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इसका खंडन करते हुए पूरे परिसर को सुरक्षित बताया था।साथ ही कहा था कि भूकंप से स्तूप की ऊंचाई को कोई फर्क नहीं पड़ा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश के दौरान जिधर खुदाई नहीं हुई है उधर की ईंटें अक्सर खिसकती रहती हैं। इन दिनों खुदाई का काम बंद होने से भी यह स्थल उपेक्षित सा हो गया है।

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