पटना [जेएनएन]। होली (Holi 2019) कल है। इसकी परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि इसकी परंपरा बिहार से आरंभ हुई है। अनुश्रुतियों पर विश्‍वसा करें तो बिहार के पूर्णिया जिले के धरहरा गांव में पहली बार होली मनाई गई थी। इसके साक्ष्य भी मिले हैं। वहां होलिका दहन के दिन करीब 50 हजार श्रद्धालु राख और मिट्टी से होली खेलते हैं।
यहीं हुआ था नरसिंह अवतार
पूर्णिया के बनमनखी का सिकलीगढ़ धरहरा गांव होलिका दहन की परंपरा के आरंभ का गवाह है। मान्यता के अनुसार यहीं भगवान नरसिंह ने अवतार लिया था और यहीं होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी थी। यहीं से होलिकादहन की शुरुआत हुई थी।
आज भी मौजूद स्‍तंभ का अवशेष
माना जाता है कि सिकलीगढ़ में हिरण्यकश्यप का किला था। वहां भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए खंभे से भगवान नरसिंह ने अवतार लिया था। धारणा है कि उस स्तंभ का हिस्सा (माणिक्य स्तंभ) आज भी मौजूद है, जहां राजा हिरण्यकश्यप का वध हुआ था। यह स्तंभ 12 फीट मोटा और लगभग 65 डिग्री पर झुका हुआ है।
दिए जाते ये साक्ष्‍य
गुजरात के पोरबंदर में विशाल भारत मंदिर है। वहां लिखा है कि भगवान नरसिंह का अवतार स्थल सिकलीगढ़ धरहरा बिहार के पूर्णिया जिला के बनमनखी में है। गीता प्रेस, गोरखपुर के 'कल्याण' के 31वें वर्ष के तीर्थांक में भी इसका उल्‍लेख है। भागवत पुराण (सप्तम स्कंध के अष्टम अध्याय) में भी माणिक्य स्तंभ स्थल का जिक्र है। उसमें कहा गया है कि इसी खंभे से भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी।
राख से खेली जाती होली
धरहरा गांव के लोग रंग-गुलाल की जगह राख से होली खेलते हैं। उनका कहना है कि जब होलिका भस्म हुई थी और भक्त प्रह्लाद जलती चिता से सकुशल वापस लौट आए थे तो लोगों ने राख और मिट्टी लगाकर खुशियां मनाई थी। तभी से राख व मिट्टी से होली खेलने की शुरूआत हुई।

Posted By: Amit Alok