पटना [प्रभात रंजन]। दुर्गापूजा की भक्ति में पूरा बिहार डूब गया है। बंगाली समुदाय की परंपरा के अनुसार षष्ठी पूजा के साथ ही बांग्ला मंडपों में विराजमान मां दुर्गा के पट खुल गए। मां दुर्गा के षष्‍इी रूप मां कात्यायनी की पूजा करने के बाद पटना के यारपुर कालीबाड़ी मंदिर, बंगाली अखाड़ा, रामकृष्ण मिशन आश्रम आदि जगहों पर पूजा शुरू हो गई। इसके साथ ही बांग्ला मंडपों में ढाक के मद्धम स्वर से पंडाल परिसर गूंज उठा। खास बात कि यहां की पूजा का विशेष विधान है। सात समंदर के पानी को एकत्र कर माता की पूजा होती है। इतना ही नहीं,  एक समय था जब बंगाली अखाड़े में स्वतंत्रता संग्राम के दीवानों की भीड़ लगी रहती थी।

बांग्ला पूजा पंडालों में उमड़ने लगी भीड़

राजधानी पटना के प्रमुख बांग्ला पूजा पंडालों और मंदिरों में मां दुर्गा की अर्चना के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। मंदिर के अंदर जहां वैदिक मंत्रों के साथ मां की पूजा हो रही थी, वहीं दूसरी ओर परिसर में ढाक के मद्धम स्वर बज रहे थे। ढोल, नगाड़े के साथ साढ़े तीन घंटे तक चली पूजा के बाद भक्तों के लिए मां के पट खोल दिए गए। पूजन के बाद मां को आमंत्रण भेजा गया। प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करने के बाद मां की विधिवत पूजा की गई। मां को मंगल सूत्र से बांध कर विनती की गई।

बंगाल से आए पुरोहित

मां की पूजा करने के लिए बंगाल के बांकुरा जिले से पुरोहित आए हैं। ढाक बजाने के लिए कोलकाता से आए कलाकारों का योगदान रहा। कालीबाड़ी मंदिर के संयुक्त सचिव अशोक चक्रवर्ती ने कहा कि 67 वर्षों से मां की आराधना हो रही है। इसके पूर्व मंदिरों और पंडालों में बोधन पूजा आरंभ हुआ। बंगाली अखाड़ा पूजा समिति के उपाध्यक्ष समीर राय ने कहा कि अखाड़ा में मां की पूजा बोधन पूजा के साथ आरंभ हुई और इसी दिन शाम मां की प्रतिमा का पट खुल गया। वहीं षष्ठी पूजा के दौरान मां का भव्य श्रृंगार कर पूजा-अर्चना की गई। वहीं कालीबाड़ी मंदिर में शुक्रवार षष्ठी पूजा के साथ मां की प्रतिमा का दीदार भक्तों ने किया। 

विर्सजन के दिन होगा सिंदूर खेला

शनिवार को सप्तमी पूजा के दिन पुष्पांजलि के बाद मां को प्रसाद चढ़ाया जाएगा। श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण होगा। अष्टमी के दिन संधि पूजा का आयोजन होगा। इसमें 108 दीपक जलाए जाएंगे। इसके बाद मां को प्रसाद अर्पित किया जाएगा। वहीं नवमी के दिन मां की पूजा अर्चना होगी। फिर दशमी तिथि को कलश का विसर्जन होने के बाद सिंदूर खेला का आयोजन किया जाएगा। बंगाली रीति रिवाज के मां दुर्गा के मायके से जाते समय विजयादशमी के दिन सिंदूर खेला का महत्व अधिक है। सुहागिन महिलाएं मां की पूजा अर्चना करने के साथ एक दूसरे सुहागिन महिलाओं को सिंदूर लगाकर अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना करते हैं।  

बंगाली अखाड़ा की है यह विशेषता

राजधानी के  लंगर टोली स्थित बंगाली अखाड़ा की दुर्गा पूजा की विशेषता काफी अलग है। पूजा समिति के सचिव निशिथ कुमार घोष घोष बताते है कि बंगाली अखाड़े का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम से  जुड़ा है। साल 1893 के आसपास यहां कुश्ती का  माहौल था जिस कारण इसे अखाड़ा का नाम दिया  गया। 

स्वतंत्रता सेनानी  बनाते थे  यहां  रणनीति

अखाड़े में स्वतंत्रता संग्राम के दीवानों की भीड़ लगी रहती थी। अंग्रेजों के आंखों में धूल झोंकने के लिए दुर्गा मंदिर की स्थापना कर पूजा अर्चना शुरू कर दिया था। 124 सालों से यहां पर  नवरात्र के मौके पर पूजा अर्चना होती है। 

बंगाली पद्धति से होती है पूजा

यहां बंगाली  पद्धति से पूजा होती है। जानकारों की माने तो शहर में छह जगहों पर  बंगाली पद्धति में  पूजा  होती है जिसमें सबसे पुरानी जगह है। दुर्गा  पूजा में  बनने  वाली सारी प्रतिमा एक दूसरे  जुड़ी होती है। वहीं मां दुर्गा को पहनाने  वाली साड़ी  बिना काट छांट की पहनायी जाती है। बंगाल पद्धति में धुनची नृत्य का काफी महत्व है इस कारण यहां भी पूजा के दौरान धुनची नृत्य की प्रस्तुति होती है। मां की विदाई  दशमी तिथि को  दही-चूड़ा खिलाने की परंपरा है। जिसका निर्वाहन आज भी हो रहा है। 

सात समंदर के पानी से होती है पूजा

यहां की पूजा का विशेष विधान है। सात समंदर के पानी को एकत्र कर माता की पूजा होती है। साथ में पूजा के दौरान केले के पेड़ को माता की प्रतिमा के समीप रखकर पूजा की  जाती है। जिसे बंगला में बोधन कहा  जाता है। वर्षो से माता की प्रतिमा का एक  हीं स्वरूप को स्थापित किया जाता रहा है।  

षष्ठी पूजा के बाद खुलता है पट

आमतौर से माता का पट सप्तमी या अष्टमी से खुलता है लेकिन यहां पर माता का पट षष्ठी तिथि से खुल जाती है। अष्टमी के दिन माता की भव्य  पूजा आयोजित होगी। माता की पूजा के बाद कोलकाता के मशहूर कलाकार प्रसन्नजीत चक्रवर्ती भजन प्रस्तुत कर भक्तों को आनंदित करेंगे।

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