चित्रगुप्त पूजा पर विशेष : कंप्यूटर स्क्रीन ने ले ली कागज की जगह, फिर भी कलम-दवात पर आस्था बरकरार
आज के दौर में कंप्यूटर के स्क्रीन ने कागज की जगह ले ली है। छात्र जीवन में भले ही लिखना जरूरी हो लेकिन इसके बाद कलम-कागज से नाता धीरे-धीरे टूट जा रहा है। इसके बावजूद भगवान चित्रगुप्त की पूजा को लेकर ही सही कलम-दवात पर आस्था बरकरार है।

बक्सर, कंचन किशोर। Chitragupta Puja Special बक्सर के चरित्रवन के उमेश पांडेय खुद हिंदी के शिक्षक हैं और बच्चों को अक्षर ज्ञान देते हैं, लेकिन बैंक में दो-तीन बार के प्रयास के बाद ही बड़ी मुश्किल से उनके हस्ताक्षर का मिलान हो पाता है। डिजीटल और आनलाइन युग में पढ़ाई के लिए कापी-किताबों की जगह कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है। अक्षर कलम की जगह की-पैड से लिखे जाने लगे, परीक्षाएं आनलाइन होने लगीं और कागज के पन्ने एवं कलम से नाता छूटने लगा। अभी रूटीन कोर्स की परंपरागत परीक्षाएं कागज-कलम से ही ली जा रहीं हैं, इसलिए बच्चे लिखावट पर ध्यान दे रहे हैं, लेकिन एक बार स्कूल-कालेज छूटने के बाद इसकी भी जरूरत कम पड़ रही है औैर लिखने की आदत छूट जा रही है।
चित्रगुप्त पूजा में कलम-दवात की पूजा
हालांकि, बदलाव के इस दौर में भी मृत्युलोक वासियों का लेखा-जोखा रखने वाले कलम-दवात के आराध्य देव भगवान चित्रगुप्त की पूजा उसी आस्था और विश्वास के साथ की जाती है, जिस आस्था के साथ इसे कलम-दवात के जमाने में की जाती थी। कार्तिक मास के शुल्क पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाने वाली इस पूजा में कायस्थ समाज के लोग आज भी कलम दवात की पूजा करते हैं। खास बात यह कि इस दिन वे कलम को लेखनी के लिए स्पर्श तक नहीं करते हैं। हालांकि, बदलते जमाने में पूरे दिन कलम स्पर्श नहीं करने की मान्यता गौण हो गई है। कंप्यूटर शिक्षक संतोष कुमार कहते हैं कि अब कंप्यूटर व कंपोजिंग का जमाना है। ऐसे में कलम न छूने की परंपरा का निर्वहन करने में काम अब आड़े नहीं आता।
अब तो पूजा में ही काम आती है दवात
एक समय था जब दवात की स्याही में कलम डुबोकर लिखने की परंपरा थी। तब दुकानदार को अपना लेखा-जोखा रखना होता था या बच्चों को अपनी पढ़ाई करनी होती थी, उसी का उपयोग होता था। अब तो दवात की अहमियत केवल पूजा तक ही सिमट कर रह गई है। अब वह दिन कहां जब बच्चे दवात में कलम डुबोकर कापियों को अपनी लेखनी से भरा करते थे।
कंडा से शुरू सफर यहां तक पहुंचा
कंडा की कलम और दवात से शुरू परंपरा आज लीड व प्वाइंटर वाले पेन तक पहुंच गई है। कलम दवात के बाद पहले फाउंनटेन पेन (स्याही भरकर लिखने वाली नीब वाली कलम) का जमाना आया। फिर लीड व प्वाइंटर वाले पेन आए, यूज-थ्रो और फिर जेल पेन का जमाना आया और अब तो ब्रांडेड पेन भी आ गए हैं। इन सबसे अलग लेखनी की परंपरा ने कंप्यूटर के की-बोर्ड को भी अपना लिया। वरीय अधिवक्ता रामेश्वर प्रसाद वर्मा व ज्योति शंकर कहते हैं कि जमाने के साथ लेखन की परंपरा आज भले ही बदल गई हो, लेकिन, आज भी पूजा को लेकर आस्था की डोर तनिक भी कमजोर नहीं हुई है। कलम दवात के आराध्य देव की पूजा उस समय भी उसी आस्था के साथ की जाती थी, जितनी आस्था के साथ आज की जाती है।
खूब हुई कलम-कागज की बिक्री
बहरहाल, चित्रगुप्त पूजा की पूर्व संध्या बाजार में लेखन सामग्रियों की जमकर बिक्री हुई। कंपनियों ने भी इस मौके को भुनाने के लिए कई डिजाइन व कलर में पेन-पेंसिल बाजार में उतारे। गणेश स्टेशनरी के नरेश पोद्दार ने बताया कि लेखन सामग्री की मांग अब स्कूली बच्चों तक सिमट कर रह गई है। परंतु, चित्रगुप्त पूजा पर इसकी मांग जबरदस्त रहती है।
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