जिसकी गवाही से हुई भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी; उसे मौत के घाट उतारने वाला शख्स बिहार का था
भगत सिंह राजगुरु व सुखदेव को फांसी दिलवाने वाले की हत्या कर बदला लिए थे बैकुंठ शुक्ल महज 28 वर्ष की आयु में अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल ने चूम लिया था फांसी का फंदा लालगंज के जलालपुर में जन्मे बैकुंठ के चाचा योगेंद्र शुक्ल भी थे महान क्रांतिकारी

डा. चंद्रभूषण सिंह शशि, हाजीपुर। स्वाधीनता आंदोलन के अमर बलिदानी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की मुखबिरी कर फांसी दिलवाने वाले भीतरघाती गवाह फणींद्रनाथ घोष की हत्या कर इसका बदला लेने वाले अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल ने महज 28 वर्ष की उम्र में ही हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। बैकुंठ शुक्ल का जन्म लोकतंत्र की जननी वैशाली के लालगंज स्थित जलालपुर गांव में 15 मई 1907 को पिता रामबिहारी शुक्ल के घर हुआ था। इनके दादा का नाम मुन्नू शुक्ल था और इनकी शादी छपरा जिले के महमदपुर गांव के बाबू चक्रधारी सिंह की लड़की राधिका देवी के साथ हुई थी। गांव में ही प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद पड़ोस के मथुरापुर प्राथमिक स्कूल में शिक्षक बन गए थे।
कहते हैं कि 1926 में मथुरापुर गांव के राजनारायण शुक्ल के घर पर उनकी भेंट क्रांतिकारी किशोरी प्रसन्न ङ्क्षसह से हुई और उन्होंने उन्हें अपने क्रांति दल में शामिल कर लिया। वहीं महान क्रांतिकारी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापकों में से एक योगेंद्र शुक्ल के भतीजे बैकुंठ शुक्ल उनके साथ भी क्रांतिकारी संगठन से जुड़े रहे। उस समय हाजीपुर का गांधी आश्रम आंदोलनकारियों का गढ़ हुआ करता था और वह हाजीपुर एरिया का काम संभालते थे। इसी बीच वर्ष 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से कूद गए और पटना के कैंप जेल भेज दिए गए। वह करीब छह महीने तक जेल में रहने के बाद रिहा हो सके।
सोनपुर जाने के दौरान कर लिए गए थे गिरफ्तार
जिले के हुसेनीपुर गांव के राम किंकर सिंह अंग्रेजों के साथ पुलिस में थे। वे इनाम पाने के लालच में क्रांतिकारियों का सुराग देकर उन्हें पकड़वाते थे। उसी ने इशारा देकर हाजीपुर से किशोरी प्रसन्न सिंह, रामदेनी सिंह, रामबरन दास, रामभवन सिंह आदि को गिरफ्तार करवा दिया। 5 जनवरी 1933 को चंद्रमा सिंह को कानपुर से गिरफ्तार कर लिया गया। जब बैकुंठ शुक्ल हाजीपुर से गंडक नदी पुल होकर सोनपुर की ओर जा रहे थे, वहीं पुलिस से मुठभेड़ हो गई और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। बैकुंठ शुक्ल और चंद्रमा सिंह को मोतिहारी जेल में रखा गया। रामदेनी सिंह, रामवरण दास और रामभवन सिंह पर अलग से मुकदमा चला। इसमें सेसन कोर्ट ने इन्हें जेल की सजा दी।
14 मई 1934 सेंट्रल जेल में दी गई थी फांसी
गवाह फणींद्रनाथ घोष की बेतिया मीना बाजार में धारदार हथियार से हत्या कर क्रांतिकारियों के बलिदान का स्वाभिमानी बदला लेने वाले बैकुंठ शुक्ल को उसी के कत्ल की जुर्म में 14 मई 1934 सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई। फांसी के तख्ते पर चढऩे के समय उनके चेहरे पर मुस्कान थी। जेल के वार्ड से फांसी के फंदे तक जाने में वह लगातार वंदे मातरम का उद्घोष करते रहे। उन्हें इस बात का गर्व था कि देश के लिए मर मिटने से बड़ा कोई काम नहीं हो सकता।
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