बिहार में सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक का विरोध, IMA और भासा ने उठाई 5 मांगें
बिहार सरकार के सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने के प्रस्ताव का विरोध तेज हो गया है। इंडियन ...और पढ़ें

भासा के सदस्य। फोटो जागरण

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जागरण संवाददाता, पटना। बिहार सरकार द्वारा सरकारी चिकित्सकों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने के प्रस्ताव को लेकर बिहार में विरोध तेज हो गया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ (भासा) और विश्व आयुर्वेद परिषद ने इसे एकतरफा निर्णय बताते हुए पुनर्विचार की मांग की है।
तीनों संगठनों ने अलग-अलग बैठकों और बयानों के माध्यम से सरकार के समक्ष अपनी आपत्तियां और सुझाव रखा है। आइएमए बिहार शाखा एवं बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ की संयुक्त बैठक IMA भवन, पटना में आयोजित हुई। इसमें इस प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा की गई।
बैठक में चिकित्सकों ने कहा कि निजी प्रैक्टिस को अनिवार्य रूप से बंद करने के बजाय वैकल्पिक (ऑप्शनल) रखा जाना चाहिए। उनका तर्क था कि सरकारी सेवा में आने वाले डॉक्टरों और चिकित्सा शिक्षकों पर प्रैक्टिस नहीं करने का दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें विकल्प दिया जाना चाहिए।
बैठक में पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. सहजानंद प्रसाद सिंह, उपाध्यक्ष डा. सुनील कुमार, अवैतनिक राज्य सचिव डा. दिनेश कुमार, अध्यक्ष (भासा) डॉ. रोहित कुमार, महासचिव डॉ. हसरत अब्बास, संयुक्त सचिव डॉ. देवेश कुमार भी थे।
इधर, विश्व आयुर्वेद परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. शिवादित्य ठाकुर ने भी इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि एलोपैथ चिकित्सकों के साथ आयुर्वेद एवं आयुष डॉक्टरों को अलग रखना उचित नहीं है। उन्होंने सरकार से इस संकल्प में संशोधन कर आयुर्वेद चिकित्सकों को भी शामिल करने की मांग की।
भासा ने रखी पांच सूत्री मांग
बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ की कोर कमिटी और आइएमए सदस्यों की बैठक में सरकार के इस निर्णय की कड़ी निंदा करते हुए स्वास्थ्यकर्मियों के रोजगार पर चिंता जताई गई। भासा ने अपनी 5 प्रमुख मांगें रखते हुए कहा कि इस फैसले पर सभी हितधारकों के साथ व्यापक विमर्श हो।
यदि नीति लागू करनी ही हो तो इसे वैकल्पिक रखा जाए और वर्तमान चिकित्सकों पर बाध्यकारी न बनाया जाए। साथ ही वेतन, भत्तों और कार्य-परिस्थितियों में सुधार तथा स्वास्थ्य संस्थानों की आधारभूत संरचना मजबूत करने की मांग की गई। संघ ने चेतावनी दी कि मांगों पर विचार नहीं होने की स्थिति में राज्यव्यापी आंदोलन किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि इस निर्णय पर तत्काल पुनर्विचार करते हुए सभी हितधारकों, विशेषकर भासा के साथ विस्तृत विमर्श किया जाए। यदि नीति लागू करनी ही हो तो इसे अनिवार्य न रखते हुए वैकल्पिक बनाया जाए।
वर्तमान में कार्यरत चिकित्सकों पर इसे बाध्यकारी न बनाते हुए केवल नई नियुक्तियों पर लागू किया जाए। डॉक्टरों के वेतन, भत्तों एवं कार्य-परिस्थितियों में सुधार किया जाए। स्वास्थ्य संस्थानों की आधारभूत संरचना को सुदृढ़ किया जाएं, इससे चिकित्सकों की दक्षता प्रभावित न हो।
