Bihar Assembly: 17वीं विधानसभा में काम हुआ कम, हो-हल्ला ज्यादा; 5 साल में सिर्फ 146 दिन हुई बैठक
18वीं विधानसभा से सकारात्मक कामकाज की उम्मीद है। 17वीं विधानसभा में कम बैठकें हुईं, जिनमें शोर-शराबा अधिक रहा। केवल 146 बैठकें हुईं और विधेयकों पर विचार-विमर्श नहीं हुआ। संसदीय प्रणाली के अनुसार बैठकें कम होने से सदस्यों को मुद्दे उठाने का अवसर नहीं मिला। बहस का स्तर भी गिरा और व्यक्तिगत राग-द्वेष हावी रहे।

विकाश चन्द्र पाण्डेय, पटना। अब जबकि 18वीं विधानसभा अस्तित्व में आ रही तो उससे जनहित में सकारात्मक होकर कामकाज की अपेक्षा है। उत्पादकता के दृष्टिगत यह इसलिए भी स्वाभाविक है, क्योंकि 17वीं विधानसभा ने बैठक और बहस के बजाय विवाद-बखेड़ा में अधिक समय जाया किया।
विधायी कारणों से सत्र आवश्यक होता है, लेकिन बैठकों की घटती संख्या के साथ बहस का गिरता स्तर पिछले पांच वर्षों में चिंताजनक स्थिति तक पहुंच गया।
17वीं विधानसभा की कुल 146 बैठकें हुईं, जो अब तक की विधानसभा में सबसे कम हैं। 2020 और 2025 के बीच वर्ष में औसतन 29 दिन सदन की कार्यवाही चली। बैठकों वाले दिन में भी प्रतिदिन औसतन तीन घंटे ही कामकाज हुआ। बाकी समय शोर-शराबा में गया।
उसी अवधि में दूसरे राज्यों की विधानसभाओं की बैठकें औसतन पांच घंटे हुईं। इस हिसाब से भी बिहार विधानसभा की उत्पादकता कम रही। इसका एक कारण विपक्ष का संख्या बल भी रहा, जो इस बार कमजोर हुआ है। ऐसे में अतिशय व्यवधान की आशंका नहीं, लेकिन जनहित के मुद्दों पर चर्चा और विधेयकों पर विचार-विमर्श के लिए सत्ता पक्ष को भी सकारात्मक होना होगा।
उल्लेखनीय यह कि निवर्तमान विधानसभा में सभी 78 विधेयक प्रस्तुत किए जाने के दिन ही पारित हो गए। स्पष्ट है कि समीक्षा और विचार-विमर्श के लिए उन्हें किसी भी स्थायी समिति को नहीं सौंपा गया। ऐसे में समितियों की परिकल्पना ही बेमानी हो जाती है।
प्राय: ऐसा होता है कि बैठकें कम होने से महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा नहीं हो पाती और इस कारण भी हंगामे की नौबत बन आती है। वैधानिक तौर पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं, लेकिन संसदीय कार्य-प्रणाली के निर्धारण के समय एक अघोषित सहमति बनी थी कि वर्ष भीतर बड़ी विधानसभाओं में 100 से 120 और छोटी विधानसभाओं में 50 से 60 बैठकें होनी चाहिए।
ऐसा संभव होता, लेकिन विधायकों द्वारा कई बार ऐसी स्थिति निर्मित कर दी जाती है कि समय से पहले ही सत्रावसान करना पड़ता है। परिणामस्वरूप अनेक सदस्यों की शिकायत होती है कि वे अपने क्षेत्र और जनहित के मामलों को सदन में उठाने से वंचित रह गए।
लंबी अवधि के सत्र में शोर-शराबे के कारण विधायी कार्यों में अवरोध की अवधि भी तदनुरूप लंबी होती जाती है और कार्य-संचालन पर अपेक्षाकृत अधिक व्यय होता है। इससे भी अधिक चिंतनीय बहस के स्तर का कमतर होते जाना है। अफसोस यह कि खींचतान और कहासुनी के अलावा 17वीं विधानसभा ने अब तक बहस का ऐसा कोई अवसर सुलभ नहीं कराया, जो संसदीय इतिहास में उल्लेखनीय हो सके।
आरक्षण की सीमा में वृद्धि और सरकार के स्वरूप में परिवर्तन के दो अवसरों पर इसका संयोग बना था, लेकिन तब भी बहस पर व्यक्तिगत राग-द्वेष हावी हो गया।
विधायिका और उत्पादकता
- संक्षिप्त बैठकों के कारण जनहित के मुद्दों पर सार्थक बहस की संभावना कम
- बहस के गिरते स्तर से संसदीय व्यवस्था के प्रति बढ़ता है विश्वास का संकट
बैठकों की संख्या
| क्रमांक | विधानसभा | बैठकों की संख्या |
|---|---|---|
| 1 | पहली | 391 |
| 2 | दूसरी | 434 |
| 3 | तीसरी | 330 |
| 4 | चौथी | 94 |
| 5 | पांचवीं | 123 |
| 6 | छठी | 265 |
| 7 | सातवीं | 144 |
| 8 | आठवीं | 208 |
| 9 | नौवीं | 169 |
| 10 | दसवीं | 176 |
| 11 | ग्यारहवीं | 155 |
| 12 | बारहवीं | 162 |
| 13 | तेरहवीं | — |
| 14 | चौदहवीं | 174 |
| 15 | पंद्रहवीं | 189 |
| 16 | सोलहवीं | 154 |
| 17 | सत्रहवीं | 146 |
(नोट : चौथी, पांचवीं और सातवीं विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्ष से कम रहा। 2005 में 13वीं विधानसभा बिना कोई बैठक किए ही विघटित हो गई। तब वर्ष भीतर दूसरा चुनाव हुआ था।)
17वीं विधानसभा का ब्योरा :
विधेयक : 78 विधेयक पास हुए ऐन दिन। उनमें सर्वाधिक 24 प्रतिशत शिक्षा से संबंधित रहे। 18-18 प्रतिशत प्रशासन और वित्त से। सबसे कम एक प्रतिशत सहकारिता से।
अध्यादेश : सात अध्यादेश आए पांच वर्षों में। सबसे कम अध्यादेश का रिकार्ड। सर्वाधिक 144 अध्यादेश आए थे 1990 से 1994 के बीच।
बजट : औसतन 10 दिन हुई है बजट पर चर्चा। पिछले पांच वर्षों में विभागों के खर्च पर औसतन नौ दिन चर्चा हुई।
- 2003 से कोई विधेयक विचारार्थ समिति के समक्ष नहीं भेजा गया। पिछले 25 वर्षों से इसकी परंपरा-सी बन गई है।
- 4.1 घंटे औसतन बैठक हुई 2023 के बजट सत्र में, यह बैठकों का सर्वाधिक समय
- 0.9 घंटे औसतन बैठक हुई 2025 में मानसून सत्र में, यह कामकाज का न्यूनतम समय

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