नागार्जुन जयंती: बाबा को भाती थी डाकबंगला की कॉफी, मछली भात था पसंद Patna News
यात्री नाम से भी जाने गए बैद्यनाथ मिश्र उर्फ नागार्जुन के ने दुनिया जहां का चक्कर लगाया पर कहीं टिके नहीं। उनकी जयंती पर पढ़ें पटना से जुड़ी उनकी यादें।
अक्षय पांडेय, पटना। बैद्यनाथ मिश्र उर्फ नागार्जुन के काव्यलोक से गुजरने के क्रम में एक ठिकाना पटना भी रहा। वे कहीं टिके नहीं पर राजधानी में इतना समय बिताया कि यादों को ठहराव मिला। यहीं पर रहकर मिथिला के लोगों के लिए सोचा और चेतना समिति की स्थापना की। डाकबंगला चौराहे के कॉफी हाउस में बैठकी लगाई और मछली-भात को अपना पसंदीदा भोजन बनाया।
नागार्जुन ने रखा था ऊषा किरण खान के बच्चों का नाम
पद्मश्री ऊषा किरण खान के पास नागार्जुन से जुड़ी यादों का पिटारा है। वो नागार्जुन को बाबा कहकर से पुकारती थीं। ऊषा कहती हैं, बाबा ने ही मेरे अंदर साहित्य के लिए ऊर्जा जगाई। उन्होंने ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया। वो पटना आते थे मेरे ही घर में रहकर किसी के यहां जाते थे। उनकी पत्नी भी हमारे घर पर रहा करती थीं। जब मैं हॉस्टल में रहती थी तो बाबा मेरे लोकल गार्जियन की भूमिका निभाते थे। उन्होंने कभी पिता की कमी नहीं महसूस होने दी। मेरे दोनों बच्चों बेटी अंशु और बेटे तुहिन का नाम भी बाबा ने ही रखा था।
मिथिलांचल के लोगों की करते थे फिक्र
मैथिली अभिनेत्री प्रेमलता मिश्र नागार्जुन को काका कहकर पुकारती थीं। वे बताती हैं, काका को मिथिलांचल के लोगों की फिक्र थी। इस कारण उन्होंने ही चेतना समिति की स्थापना की थी। उनकी कलम में मिथिला की माटी कि खुशबू थी। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से नेताओं को ललकारा था। जिस कारण वे जेपी और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल भी गए। काका महिलाओं के आगे बढ़ाने पर जोर देते थे। तब के डाकबंगला चौराहे पर बने कॉफी हाउस में बैठकर देश दुनिया की चिंता करते थे। वो कहते थे कि भविष्य नवपुरिया (नए लागों) का है। नागार्जुन के साथ पटना के महेंद्रू में काफी समय रहीं प्रेमलता बताती हैं कि मेरी रुचि को देखते हुए काका ही मुझे पहली बार आकाशवाणी लेकर गए थे। उन्होंने ही मुझे अभिनय करने के लिए प्रेरित किया था।
बच्चों को सुनाते थे यात्रा का संस्मरण
पटना संग्र्रहालय के शोध सहायक शिवकुमार मिश्र बताते हैं कि बाबा को बच्चों के साथ बैठना और बात करना बहुत पसंद था। लूडो और कैरम खेलने के साथ वो अपनी यात्रा का संस्मरण सुनाया करते थे। शिवकुमार भी उस वक्त मंदिरी से लोदीपुर अपने ससुराल नागार्जुन से मिलने जाते थे। करीब 25 साल पहले उनका दिया खादी का रुमाल आज भी शिवकुमार अपने पास संजो कर रखें हैं। शिवकुमार बताते हैं कि बाबा को मछली और भात बड़ा पसंद था।
अशोक राजपथ से किताबें खरीदते थे बाबा
लेखक और डायरेक्टर अविनाश दास बताते हैं, 1993-94 में प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन में बाबा के साथ मैं पटना आया था। हम दोनों मैथिली समालोचक मोहन भारद्वाज के घर गए थे। लोगों ने बाबा से कई सवाल किए इस बीच मैंने भी पूछ लिया, साहित्य की नयी पीढ़ी के बारे में आप क्या सोचते हैं? उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर कहा जब पीढ़ा घिसता है, तो पीढ़ी बनती है।
अविनाश बताते हैं कि बाबा साइंस कॉलेज के सामने राजकमल प्रकाशन की किताब दुकान से पुस्तकें खरीदते थे। बाबा मुझे हफ्ते में पचास रुपये देते थे और दूसरे दिन कुछ पत्रिकाएं लाने के लिए बोलते थे। उनमें बांग्ला पत्रिका 'देस' और अंग्रेजी की पत्रिका 'फ्रंटलाइन' जरूर होती थी। हिंदी और अंग्रेजी का कोई आर्टिकल पढ़ कर सुनाने के लिए कहते थे। अंग्रेजी लडखड़़ाती थी, तो दुरुस्त करते थे। बांग्ला सीखने को बोलते थे।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।