जंगल की शक्ल ले चुके ये प्राचीन बरगद के पेड़, इन्हें देखकर हैरत में पड़ जाएंगे आप
बिहार के मधुबनी में सदियों पुराने बरगद के कई पेड़ पीढिय़ों से लोगों को सुकून की छांव व ऑक्सीजन दे रहे हैं। हर पेड़ की कोई न कोई कहानी है। आइए डालते हैं लजर।
मधुबनी [सुनील कुमार मिश्र]। एक तरफ धरती से हरियाली खत्म हो रही है तो दूसरी तरफ ऐसे भी स्थल हैं, जहां सैकड़ों साल पुराने पेड़ आज भी खड़े हैं। बिहार के मधुबनी में 400 वर्ष तक के कई पुराने पेड़ आज भी मौजूद हैं। मधुबनी के विश्व प्रसिद्ध सौराठ सभा में पीपल के ऐसे प्राचीन पेड़ हैं। यहां के ही चनौरागंज सुखेत के पास सड़क से कुछ दूर लगभग दो बीघे में फैला बरगद का एक विशाल पेड़ बरबस ध्यान खींचता है। मधुबनी के ही बिस्फी स्थित जगवन में भी लगभग दो एकड़ में एक ही जड़ से दर्जनों शाखाओं वाला विशाल बरगद खड़ा है। इन पेड़ों से कई कहानियां भी जुड़ी हैं। आज इन्हें संरक्षण की दरकार है।
पीढिय़ों से दे रहे सुकून की छांव व ऑक्सीजन
मधुबनी में सदियों पुराने बरगद के कई पेड़ पीढिय़ों से लोगों को सुकून की छांव व ऑक्सीजन दे रहे हैं। हर पेड़ की कोई न कोई कहानी है। इनमें से कइयों की पूजा होती है। इनके कारण आसपास का औसत तापमान भी कम रहता है। मगर, देखरेख के अभाव में अब ये धीरे-धीरे सूख रहे हैं। ये बरगद अब सुरक्षा और संरक्षण मांग रहे हैं। वन विभाग के अधिकारी ध्यान देने की बात करते हैं। जिलाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक भी कहते हैं कि वे पुराने पेड़ों के संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं। लेकिन ये प्रयास जमीन पर दिखाई नहीं दे रहे।
जंगल का अहसास देता सात सौ साल पुराना पेड़
बिस्फी के याज्ञवल्क्य आश्रम (जगवन) में लगभग साढ़े तीन बीघे में बरगद का पेड़ है। तकरीबन 700 वर्ष पुराने दर्जनों शाखाओं वाले पेड़ के आसपास जंगल-सा एहसास होता है। कहा जाता है कि जगवन में ऋषि याज्ञवल्क्य रहते थे। वैदिक ऋचाओं की ध्वनि गूंजती थी। बाद में याज्ञवल्क्य ऋषि की याद में यहां एक मंदिर का निर्माण किया गया। मंदिर के पुजारी विजय यादव की मानें तो मिथिला में प्राचीन काल से ही पेड़ों के संरक्षण की प्रवृत्ति रही है।
यहां दो बीघे में फैला तीन सौ साल पुराना बरगद
मधुबनी के मंगरौनी राज तालाब के पूर्वी भिंडा पर चार सौ वर्ष पुराना बरगद का पेड़ है। रहिका प्रखंड के वसौली में वन दुर्गा स्थान पर तीन सौ साल पुराना बरगद है। यह लगभग दो बीघे में फैला है। अकशपुरा में सड़क किनारे लगभग तीन सौ साल पुराना बरगद का पेड़ अंतिम सांस ले रहा है। घोघरडीहा प्रखंड के सांगी गांव में सड़क किनारे तकरीबन दो सौ वर्ष पुराना विशाल बरगद का पेड़ है।
सौराठ सभा में खड़े पीपल के कई प्राचीन वृक्ष
मधुबनी की सौराठ सभा शादियों के लिए विख्यात है। यहां गर्मी के मौसम में मैथिल ब्राह्मणों की वैवाहिक सभा लगती थी। इसे दरभंगा राज का संरक्षण प्राप्त था। इस स्थान पर शादी योग्य लड़कों व लड़कियों को लेकर परिवार वाले आते हैं और बातचीत कर शादी तय करते हैं। आधुनिक काल में यह परंपरा जरूर कमजोर पड़ी है, लेकिन जिंदा है। इस स्थल पर पीपल के अनेक पुराने पेड़ हैं।
इसी तरह सतलखा डीह पर तीन सौ वर्ष पुराना पीपल का वृक्ष है। इसके नीचे ग्रामीण ब्रह्म बाबा की पूजा करते हैं।
विशेषज्ञ बोले: बड़े काम के ये पेड़, होगा संरक्षण
वनों के क्षेत्र पदाधिकारी प्रमोद कुमार सिन्हा कहते हैं कि विभाग पुराने पेड़ों के संरक्षण की दिशा में काम कर रहा है। पीपल और बरगद जैसे पेड़ 15 फीसद अधिक ऑक्सीजन देते हैं। भीषण गर्मी में भी इसके नीचे का तापमान लगभग पांच डिग्री सेल्सियस कम रहता है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वानकी विभाग के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. आरके झा का कहना है कि बरगद का वृक्ष लंबी आयु तक हजारों टन कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है। 50 साल का पुराना पौधा 400 टन कार्बन डाइऑक्साइड संग्रहित कर रखता है। यह जलस्तर व जैव विविधता को भी बढ़ाता है। सरकार ने सामुदायिक वानिकी के लिए इसे उपयुक्त माना है। इनके संरक्षण की कोशिश की जा रही है।
पीढिय़ों से दे रहे सुकून की छांव व ऑक्सीजन
मधुबनी में सदियों पुराने बरगद के कई पेड़ पीढिय़ों से लोगों को सुकून की छांव व ऑक्सीजन दे रहे हैं। हर पेड़ की कोई न कोई कहानी है। इनमें से कइयों की पूजा होती है। इनके कारण आसपास का औसत तापमान भी कम रहता है। मगर, देखरेख के अभाव में अब ये धीरे-धीरे सूख रहे हैं। ये बरगद अब सुरक्षा और संरक्षण मांग रहे हैं। वन विभाग के अधिकारी ध्यान देने की बात करते हैं। जिलाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक भी कहते हैं कि वे पुराने पेड़ों के संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं। लेकिन ये प्रयास जमीन पर दिखाई नहीं दे रहे।
जंगल का अहसास देता सात सौ साल पुराना पेड़
बिस्फी के याज्ञवल्क्य आश्रम (जगवन) में लगभग साढ़े तीन बीघे में बरगद का पेड़ है। तकरीबन 700 वर्ष पुराने दर्जनों शाखाओं वाले पेड़ के आसपास जंगल-सा एहसास होता है। कहा जाता है कि जगवन में ऋषि याज्ञवल्क्य रहते थे। वैदिक ऋचाओं की ध्वनि गूंजती थी। बाद में याज्ञवल्क्य ऋषि की याद में यहां एक मंदिर का निर्माण किया गया। मंदिर के पुजारी विजय यादव की मानें तो मिथिला में प्राचीन काल से ही पेड़ों के संरक्षण की प्रवृत्ति रही है।
यहां दो बीघे में फैला तीन सौ साल पुराना बरगद
मधुबनी के मंगरौनी राज तालाब के पूर्वी भिंडा पर चार सौ वर्ष पुराना बरगद का पेड़ है। रहिका प्रखंड के वसौली में वन दुर्गा स्थान पर तीन सौ साल पुराना बरगद है। यह लगभग दो बीघे में फैला है। अकशपुरा में सड़क किनारे लगभग तीन सौ साल पुराना बरगद का पेड़ अंतिम सांस ले रहा है। घोघरडीहा प्रखंड के सांगी गांव में सड़क किनारे तकरीबन दो सौ वर्ष पुराना विशाल बरगद का पेड़ है।
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सौराठ सभा में खड़े पीपल के कई प्राचीन वृक्ष
मधुबनी की सौराठ सभा शादियों के लिए विख्यात है। यहां गर्मी के मौसम में मैथिल ब्राह्मणों की वैवाहिक सभा लगती थी। इसे दरभंगा राज का संरक्षण प्राप्त था। इस स्थान पर शादी योग्य लड़कों व लड़कियों को लेकर परिवार वाले आते हैं और बातचीत कर शादी तय करते हैं। आधुनिक काल में यह परंपरा जरूर कमजोर पड़ी है, लेकिन जिंदा है। इस स्थल पर पीपल के अनेक पुराने पेड़ हैं।
इसी तरह सतलखा डीह पर तीन सौ वर्ष पुराना पीपल का वृक्ष है। इसके नीचे ग्रामीण ब्रह्म बाबा की पूजा करते हैं।
विशेषज्ञ बोले: बड़े काम के ये पेड़, होगा संरक्षण
वनों के क्षेत्र पदाधिकारी प्रमोद कुमार सिन्हा कहते हैं कि विभाग पुराने पेड़ों के संरक्षण की दिशा में काम कर रहा है। पीपल और बरगद जैसे पेड़ 15 फीसद अधिक ऑक्सीजन देते हैं। भीषण गर्मी में भी इसके नीचे का तापमान लगभग पांच डिग्री सेल्सियस कम रहता है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वानकी विभाग के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. आरके झा का कहना है कि बरगद का वृक्ष लंबी आयु तक हजारों टन कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है। 50 साल का पुराना पौधा 400 टन कार्बन डाइऑक्साइड संग्रहित कर रखता है। यह जलस्तर व जैव विविधता को भी बढ़ाता है। सरकार ने सामुदायिक वानिकी के लिए इसे उपयुक्त माना है। इनके संरक्षण की कोशिश की जा रही है।
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