मुजफ्फरपुर । 'उपाध्यात् दश आचार्य: आचार्याणा शतं पिता।

यानी, व्यक्ति के निर्माण में उपाध्याय (वेदों को जानने वाले) से दस गुना श्रेष्ठ एक आचार्य (आध्यात्मिक गुरु व वेदों-शास्त्रों के ज्ञाता) होता है। वहीं पिता सौ आचार्यो के बराबर होते हैं। छोटे से इस श्लोक का आज भी व्यापक अर्थ है। इसका उदाहरण हैं, पूर्व कुलपति डॉ. रिपुसूदन श्रीवास्तव। शिक्षा, संस्कार व अनुशासन की दीक्षा से उनके तीनों बच्चों न केवल सिविल सर्विसेज की परीक्षा में सफल हुए बल्कि आज ऊंचाइयों पर हैं। बड़े पुत्र प्रतीक प्रियदर्शी भारतीय एलाइड सेवा में चयनित होने के बाद बीमा क्षेत्र में अधिकारी रहे। छोटे पुत्र प्रत्यय अमृत भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी है। ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव के रूप में बिहार सरकार ने उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। जबकि आइपीएस पुत्री प्रज्ञा ऋचा मध्यप्रदेश में एडीजीपी पद पर कार्यरत हैं।

डॉ. श्रीवास्तव कहते हैं, किसी बच्चों पर कभी दबाव नहीं डाला। उनको ही तय करने दिया कि क्या करना है। मगर, हमेशा गाइड की भूमिका में रहा। स्कूलों के चयन को लेकर सजग रहा। ताकि, जो संस्कार व अनुशासन बच्चों को दिए वह अक्षुण्ण रहे। वे कहते हैं, बच्चों के लिए माता-पिता सबसे महत्वपूर्ण हैं। उनका व्यक्तित्व उनपर सबसे ज्यादा असर डालता है। इसलिए बच्चों में अच्छे संस्कार के लिए माता-पिता को अधिक त्याग करने की जरूरत है। 70 के दशक की बात याद करते हुए कहते हैं, तब मनोरंजन के रूप में रेडियो हुआ करता था। बच्चों की पढ़ाई में बाधा न हो इसलिए उन्होंने रेडियो तक भी घर में नहीं रखा। खुद को बच्चों के अनुरूप ढाल लिया। आज परिणाम सामने है। बच्चों पर फख्र भी है। ऐसे बच्चे सबों को मिले।

जो भी हूं, पिता के कारण

ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत कहते हैं, वे आज जो भी हैं पिता के कारण। वे नहीं होते तो शायद ही यह मुकाम मिल पाता। सभी तीनों भाई-बहनों का सौभाग्य है कि उन्हें ऐसा पिता मिला। यह नहीं कि बस जरूरतों को पूरा कर दिया गया। जो संस्कार उनसे मिला वह आज भी काम आ रहा। उनका व्यक्तित्व हमेशा प्रेरणास्रोत रहा। आज भी जो आदतें हैं वे उनके व्यक्तित्व का ही प्रभाव है। ईश्वर हर किसी को ऐसे पिता दें। श्री अमृत एक पुत्र के रूप में कर्तव्य का भी अहसास कराते हैं। कहते हैं, जिनके भी माता-पिता हैं वे उनका आदर करें।

Posted By: Jagran

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