समस्तीपुर, [पूर्णेंदु कुमार]। रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल पर्यावरण के साथ मानव सेहत के लिए भी नुकसानदायक है। इसे देखते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा जैविक कीटनाशक पर काम कर रहा। इसमें उसे बड़ी सफलता मिली है। उसने मिश्रीकंद (वैज्ञानिक नाम पचिराइजस इरोसस) के बीज से जैविक कीटनाशक तैयार किया है। इसका प्रयोग भी सफल रहा है। जल्द ही इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू होगा।

अखिल भारतीय कंदमूल अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2016 में कंदमूल प्रजाति के पौधों पर रिसर्च के दौरान कृषि विवि के बीज निदेशक डॉ. पीपी सिंह को मिश्रीकंद के बीज में कीटनाशी गुण होने की जानकारी मिली। उसी साल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली से इस संबंध में शोध के लिए सहमति ली गई। विवि के डॉ. आशीष नारायण और डॉ. जीएस गिरि के साथ शोध में पता चला कि इसके बीज में 'रोटेेननÓ नामक तत्व पाया जाता है, जो विषाक्त होता है। फिर उन्होंने इसका इस्तेमाल कीटनाशी के रूप में फसलों पर करने का निर्णय लिया। सरसों में लगने वाली लाही, तंबाकू के पौधों में लगने वाली इल्ली व सब्जियों का पत्ता खाने वाले कीड़ों पर इसका प्रयोग किया गया, जो सफल रहा। शोध के दौरान इस कीटनाशी का प्रयोग मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर सहित अन्य जिलों के अलावा महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और हैदराबाद में भी किया गया। छह वर्षों तक अनुसंधान और इस्तेमाल के बाद नतीजे उत्साहजनक मिले।

इस तरह बनाते कीटनाशक

मिश्रीकंद के कंद (फल) को छोड़कर अन्य भाग खाने में इस्तेमाल नहीं होता है। कीटनाशी बनाने के लिए इसके बीज को मशीन सेे दरदरा पीसा जाता है। फिर उसे 24 घंटे तक पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद उसे छानकर पानी का इस्तेमाल कीटनाशी के रूप में होता है। एक लीटर कीटनाशक बनाने में 50 ग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। बिहार में तकरीबन 500 हेक्टयर में मिश्रीकंद की खेती होती है। इससे किसानों से आसानी से बीज उपलब्ध हो जाएगा। एक किलो बीज की कीमत 300 रुपये है।विज्ञानी डॉ. पीपी सिंह का कहना है कि पूरा रिसर्च कुलपति डॉ. आरसी श्रीवास्तव के नेतृत्व में चला। जल्द ही विश्वविद्यालय में होने वाली कृषि अनुसंधान परिषद की बैठक में शोध की रिपोर्ट रखी जाएगी। वहां से हरी झंडी मिलने के बाद पेटेंट कराने की दिशा में कार्य किया जाएगा। इसका व्यावसायिक उत्पादन भी होगा। इस कीटनाशी का इस्तेमाल और प्रभाव पर्यावरण के अनुकूल है। इससे उत्पादित फसल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी नहीं है।