मुजफ्फरपुर,[मुकेश कुमार 'अमन']। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की सोमवार को 111वीं जयंती है। दिनकर का जन्म 23 सितंबर, 1908 को बेगूसराय के सिमरिया में हुआ था। 67 साल पहले उन्होंने 'रश्मिरथी' की यहीं रचना की थी। तब वे लंगट सिंह महाविद्यालय में शिक्षक (1950 से 1952 तक) रहे थे। 1952 में प्रकाशित हुई 'रश्मिरथी', जिसका अर्थ 'सूर्य की सारथी' है, उसमें उन्होंने कर्ण की महाभारतीय कथानक से ऊपर उठाकर उसे नैतिकता और वफादारी की नई भूमि पर खड़ा कर उसे गौरव से विभूषित कर दिया है। 'रश्मिरथी' में दिनकर ने कर्ण के चरित्र के सभी पक्षों का सजीव चित्रण किया है।

  सारे सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को नए सिरे से जांचा है। चाहे गुरु-शिष्य संबंधों के बहाने हो, चाहे अविवाहित मातृत्व और विवाहित मातृत्व के बहाने हो, चाहे धर्म के बहाने हो, चाहे छल-प्रपंच के बहाने। युद्ध में भी मनुष्य के ऊंचे गुणों की पहचान के प्रति ललक का काव्य है 'रश्मिरथी'। यह भी संदेश देता है कि जन्म-अवैधता से कर्म की वैधता नष्ट नहीं होती। अपने कर्मों से मनुष्य मृत्यु-पूर्व जन्म में ही एक और जन्म ले लेता है। अंतत: मूल्यांकन योग्य मनुष्य का मूल्यांकन उसके वंश से नहीं, उसके आचरण और कर्म से ही किया जाना न्यायसंगत है।

नाट्य मंचन से रश्मिरथी को जानने का मौका

प्राचार्य प्रो. ओमप्रकाश राय ने बताया कि जयंती पर भव्य समारोह के बीच दिनकर की प्रतिमा का अनावरण होगा। गोवा की राज्यपाल डॉ. मृदुला सिन्हा प्रतिमा का अनावरण करेंगी। 'सामासिक चेतना के कवि दिनकरÓ विषय पर सेमिनार भी होगा। शाम में खेल मैदान में रश्मिरथी नाट्य की अद्भुत प्रस्तुति होगी। इस कालजयी रचना की नाट्य प्रस्तुति आपको रोमांच से भर देगी।

लिम्का गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में नामित मुंबई के प्रख्यात रंगकर्मी मुजीब खांन और उनकी सांस्कृतिक टीम अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों से आपको भावविभोर कर देगी। अगले दिन दिनकर जी पर संवाद करते हुए कवि सम्मेलन भी होगा। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, सूबे के पर्यटन मंत्री प्रमोद कुमार, नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह, सांसद अजय निषाद, कुलपति डॉ. आरके मंडल समेत शिक्षा व साहित्य जगत की तमाम हस्तियां इसका गवाह बनेंगी।

कभी जनता से दूर नहीं हुए दिनकर

हिंदी साहित्य के प्राध्यापक डॉ. सतीश कुमार राय कहते हैं कि रामधारी सिंह दिनकर ऐसे कवि थे जो सत्ता के करीब रहकर कभी जनता से दूर नहीं हुए। उनकी पंक्तियां आम लोगों के बीच कहावतों और लोक-श्रुतियों की तरह प्रचलित हुईं। ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और संबंधों के इर्द-गिर्द घूमती है। उर्वशी (1961 ई.) को छोड़कर उनकी अधिकतर रचनाएं वीर रस से ओतप्रोत है। तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के, पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के...रश्मिरथी में बखूबी उसका उदाहरण मिलता है। 'उर्वशी प्रेम, वासना और अध्यात्म का अदभुत संगम है। दिनकर जिंदगी में रूमानी और साफ दिल थे, उसका प्रमाण 'रसवंती, 'उर्वशी में मिलता है। उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की। एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया।  

Posted By: Ajit Kumar

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