खुदीराम बोस शहादत दिवस: पोटली में पिस्टल और टिफिन में बम; मिशन अंग्रेज से बदला लेना ... Muzaffarpur News
दुबली-पतली काया मगर इरादा दृढ़। प्रण ऐसा कि जीयो तो देश के लिए मरो तो देश के लिए...। कुछ ऐसा ही व्यक्तित्व था 18 साल के खुदीराम बोस का। 11 अगस्त 1908 को दी गई थी फांसी।
मुजफ्फरपुर, [अमरेन्द्र तिवारी]। दुबली-पतली काया, मगर इरादा दृढ़। प्रण ऐसा कि जीयो तो देश के लिए, मरो तो देश के लिए...। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर से मुजफ्फरपुर तक का सफर। खाने की पोटली में पिस्टल और टिफिन में बम। मिशन एक ही, अंग्रेज जज किंग्सफोर्ड से बदला लेना। करीब 18 साल के खुदीराम बोस का व्यक्तित्व ऐसा ही था।
दोस्त प्रफुल्ल चाकी के साथ सन 1908 में मुजफ्फरपुर पहुंचे। स्टेशन के पास पुरानी धर्मशाला में ठहरे। वहां रहकर रेकी की। इन बातों को याद करते हुए 99 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी रामसंजीवन ठाकुर बताते हैं कि उस समय युवाओं में गजब का जज्बा था। नशा एक ही, अंग्रेजों को भगाओ और देश को आजादी दिलाओ। वे कहते हैं कि किंग्सफोर्ड पर हमले की बात 30 अप्रैल 1908 की है। उसकी बग्घी पर बम मारने के बाद उसी रात नंगे पांव करीब 24 मील दूर दौड़ते हुए खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी वैनी वर्तमान पूसा रोड स्टेशन पहुंच गए। वहां पानी और चाय पीने के लिए ठहरे। रेडियो पर समाचार आ रहा था, दोनों खबर सुनने लगे। सूचना आई कि किंग्सफोर्ड बच गया। अचानक उनके मुंह से निकल पड़ा, 'अरे बच गया'। इतना सुनने के बाद वहां तैनात रेलवे कर्मचारी ने पुलिस को सूचना दी और खुदीराम बोस पकड़े गए। प्रफुल्ल चाकी वहां से निकले और बाद में अंग्रेज पुलिस से घिरने के बाद खुद को गोली मार ली।
11 अगस्त को दी गई फांसी
मुजफ्फरपुर में उनके केस का ट्रायल चला। त्वरित कार्रवाई करते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने 11 अगस्त 1908 को मुजफ्फरपुर जेल में ही खुदीराम बोस को फांसी दे दी। हमले में बचे अंग्रेज जज किंग्सफोर्ड ने भी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बाद में क्रांतिकारियों के भय से बीमार हालत में उसका निधन हो गया। फांसी पर झूलने वाले खुदीराम देश केसबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे।
जहां से किया प्रहार, अब वहां बाजार
खुदीराम ने जिस जगह से अंग्रेज जज पर प्रहार किया था, वह अब मूलरूप में नहीं है। वहां पीपल का पेड़ था, जिसकी ओट में छुपकर जज पर प्रहार किया। अभी वहां सब्जी व फल की बिक्री होती है। सामने बाजार है, जहां टायर मरम्मत का काम होता है। स्वतंत्रता सेनानी कहते हैं कि जिस पुरानी धर्मशाला में खुदीराम ठहरे थे, उसके बगल में बड़ा मैदान था। जहां सर्कस व अन्य प्रदर्शनी लगती थी। लेकिन, आजादी के बाद धीरे-धीरे धर्मशाला का वजूद खत्म हो गया। अब यह सिर्फ नाम का चौक रह गया है।
स्मृतियों को ताजा करते ये स्थल
अमर शहीद के नाम से शहर के बीच खेल मैदान, केंद्रीय कारा है। रेलवे जंक्शन पर उनके नाम का प्रवेश द्वार, सोडागोदाम चौक पर उनकी चिताभूमि है। केंद्रीय कारा, मुजफ्फरपुर में अमर शहीद का सेल व फांसी स्थल आज भी सुरक्षित है।
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