घूंघट से कारोबार तक का सफर, मुंगेर की सरिता ने 10 हजार से खड़ी की कपड़ों की दुकान, ई-रिक्शा से बदली परिवार की तकदीर
मुंगेर की सरिता देवी ने पति का रोजगार छिनने पर जीविका की मदद से 10 हजार रुपये से कपड़ों का ...और पढ़ें

पड़ों के व्यवसाय और ई-रिक्शा फेरी के जरिए आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश करतीं सरिता देवी।
HighLights
पति का रोजगार छिनने पर सरिता ने संभाली परिवार की कमान।
जीविका से 10 हजार रुपये ऋण लेकर शुरू किया कपड़ों का व्यवसाय।
सफल उद्यमी बनकर बेटियों की शादी कराई, बेटों को उच्च शिक्षा दी।
मनोज कुमार, मुंगेर। कभी घूंघट की ओट में रहकर केवल घर-गृहस्थी और चूल्हा-चौका संभालने वाली मुंगेर जिले की सरिता देवी आज अपने अद्भुत हुनर, पक्के इरादे और हौसले के बल पर पूरे परिवार की तकदीर बदल रही हैं।
जब विपरीत परिस्थितियों के बीच पति का पारंपरिक रोजगार छिन गया, तो उन्होंने हताश होकर बैठने के बजाय खुद आगे बढ़कर कारोबार की कमान अपने हाथों में ले ली।
अपने घर के छोटे से कोने से रेडीमेड कपड़ों की बिक्री से शुरू हुआ उनका यह सफर आज एक सफल और मजबूत व्यवसाय का रूप ले चुका है। आज सरिता देवी की पहचान केवल एक आम गृहिणी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह क्षेत्र की एक बेहद सफल स्वावलंबी महिला और अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं।
मुंगेर जिले के हवेली खड़गपुर प्रखंड अंतर्गत बैजलपुर पंचायत के परसडों गांव की रहने वाली सरिता देवी के पति योगेंद्र चौधरी पूर्व में ताड़ी उतारने और बेचने का काम किया करते थे, जिससे उनके छह सदस्यों के परिवार का भरण-पोषण चलता था।
राज्य में शराबबंदी कानून लागू होने के बाद उनका यह काम पूरी तरह बंद हो गया, जिससे परिवार के समक्ष गहरा आर्थिक संकट मंडराने लगा। चार बच्चों की परवरिश, भोजन और उनकी शिक्षा-दीक्षा की चिंता के बीच सरिता ने खुद परिवार की ढाल बनने का फैसला किया।
जीविका की सतत जीविकोपार्जन योजना से मिली मदद; 10 हजार के ऋण से शुरू हुआ सफर
आर्थिक तंगी के उन कठिन पलों में सरिता देवी को बिहार सरकार की 'जीविका' अंतर्गत संचालित सतत जीविकोपार्जन योजना से नई उम्मीद मिली। संस्था के माध्यम से आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने कपड़ों का व्यवसाय शुरू करने का ठोस निर्णय लिया।
इसके बाद जीविका से महज 10 हजार रुपये का शुरुआती ऋण लेकर वे भागलपुर की थोक मंडी पहुंचीं, जहां से रेडीमेड कपड़े और आकर्षक साड़ियां खरीदकर लाएं। शुरुआत में उन्होंने अपने घर से ही इन कपड़ों की बिक्री शुरू की।
तमाम शुरुआती चुनौतियों के बावजूद उनकी लगन और गुणवत्तापूर्ण व्यवहार से धीरे-धीरे ग्राहक बढ़ते गए और उनका कारोबार चल निकला।
पति भी बने व्यवसाय के साथी; ई-रिक्शा से फेरी लगाकर संवारा बच्चों का भविष्य
व्यवसाय में आमदनी बढ़ने पर सरिता ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए किस्त (फाइनेंस) पर एक ई-रिक्शा खरीदा। अब उनके पति इसी ई-रिक्शा के सहारे आसपास के कई गांवों और स्थानीय बाजारों में जाकर कपड़ों की फेरी लगाते हैं।
इस अनूठी पहल से उनके कपड़ों की पहुंच और बिक्री दोनों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। पति-पत्नी के इस साझा प्रयास और अटूट समर्पण ने परिवार के बुरे दिनों को बीते कल की बात बना दिया।
आज सरिता अपनी इस कमाई के बल पर अपनी दोनों बेटियों का मान-सम्मान के साथ विवाह संपन्न करा चुकी हैं और अपने बेटों को उच्च शिक्षा दिला रही हैं।
अपनी इस सफलता से उत्साहित सरिता अब आसपास की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार अपनाकर आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखा रही हैं।
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