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    भक्त प्रहलाद की रक्षा को ले खंभे से हुआ विष्णु का नरसिंह अवतार : विमल कृष्ण शास्त्री

    By JagranEdited By:
    Updated: Sat, 24 Aug 2019 01:11 AM (IST)

    किशनगंज। जिस समय असुर संस्कृति शक्तिशाली हो रही थी। उस समय असुर कुल में एक अदभूत बालक भ

    भक्त प्रहलाद की रक्षा को ले खंभे से हुआ विष्णु का नरसिंह अवतार : विमल कृष्ण शास्त्री

    किशनगंज। जिस समय असुर संस्कृति शक्तिशाली हो रही थी। उस समय असुर कुल में एक अदभूत बालक भक्त प्रहलाद का जन्म हुआ था। उनके पिता हिरण्यकश्यप देवताओं से वरदान प्राप्त कर निरंकुश हो गए थे। इसके बावजूद भक्त प्रहलाद विष्णु भक्त होने के साथ ईश्वर में उनकी अटूट आस्था थी। यही वजह है कि भक्त प्रहलाद के जीवन चरित्र से लोगों को सीख मिलती है। यह बातें शुक्रवार को पंडित विमल कृष्ण शास्त्री ने रेलवे स्टेशन के संकटमोचन हनुमान मंदिर परिसर में श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन कही।

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    उन्होंने कहा कि धरती पर रहने वाले सभी इंसान भक्त प्रहलाद को एक विष्णु भक्त के नाम से जानते हैं। ये निष्काम भक्तों की श्रेणी में आते हैं। निष्काम का अर्थ होता है जो अपने सुखों का त्याग पर केवल प्रभु के भक्ति में लीन रहे। प्रहलाद बचपन से ही विश्णु भक्त थे। इसका मुख्य वजह यह रहा कि नारदजी के आश्रम में ही भक्त प्रहलाद का जन्म हुआ था। जहसं वह ऋषियों और संतो के साथ रहकर छोटी उम्र में ही वेद भक्ति का ज्ञान अर्जित कर लिया था। जब एक दिन हिरण्यकश्यप प्रहलाद से पूछ बैठे कि तुम्हे क्या करना पसंद है। प्रहलाद ने बड़ नम्र स्वर में जवाब दिए कि मुझे हरि की भक्ति करना पसंद है। यह सुनते ही हिरण्यकश्यप गुस्से से तिलमिला उठा। क्योंकि उसके बड़े भाई हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने बध किया था। पिता ने प्रहलाद को बहुत समझाने की कोशिश किए कि हरि भक्ति करना छोड़ दे। लेकिन प्रहलाद की भक्ति श्री हरि के प्रति दिनोदिन बढ़ती चली गई और कहा कि पिताजी ईश्वर सर्ववयापी हैं। वे सवत्र विराजमान हैं।

    भक्त प्रहलाद की यह बात सुनते ही हिरण्यकश्यप गुस्से से गरज उठा और कहा कि क्या तेरा विष्णु महल के इस खंभे में भी है। प्रहलाद ने मधुर स्वर में जवाब दिए कि हां पिताजी इस खंभे में भी भगवान का वास है। गुस्से में आकर हिरण्यकश्यप ने गदा से खंभे पर प्रहार कर दिए। गदा के प्रहार से खंभे में दरार पड़ गई। इस खंभे से भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार का रूप लेकर निकलनार पड़ा। इसका कारण यह थाकि हिरण्यकश्यप को वरदान था कि उसकी मृत्यु किसी भी इंसान या जानवर के अलावा अस्त्र-शस्त्र से नही हो सकता। धरती और आकाश में उसका बध नही किया जा सकता। साथ ही दिन या रात में भी उसका कोई बध नही कर सकता। इस वजह से भगवान विश्णु ने नरसिंह अवतार लिए और हिरण्यकश्यप को अपने जांध पर रखकर गोधुली बेला में अपने लंबे-लंबे नाखुन से उसका सीना चीर कर बध कर दिए। इसके बाद नरिसंह भगवान ने प्रहलाद को आज्ञा दि एकि अपने पिता का अंतिम संस्कार करो। कथा के अंत में भव्य आरती हुई। इस मौके पर पंडित राम भरोसे, श्याम जी, रमेश राय, बैद्यनाथ राय, प्रदीप राय, जितेन्द्र राय, मुकेश राय, अमरजीत राय, मनोज पासवान, बैद्यनाथ पासवान और राजेश पासवान सहित कई सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।