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    Bihar Politics: कांग्रेस के गढ़ में ओवैसी की सेंधमारी, अभी तक नहीं जली है लालू की लालटेन; जानिए इस बार का समीकरण

    By Chandra SinghEdited By: Piyush Pandey
    Updated: Sun, 29 Jun 2025 05:29 PM (IST)

    बिहार की यह विधानसभा सीट जो नेपाल सीमा से सटी है कभी कांग्रेस का गढ़ थी। 2020 में एआईएमआईएम ने यहां जीत दर्ज की। इस क्षेत्र में 66% मुस्लिम मतदाता हैं। विकास की कमी और नदी कटाव यहां की प्रमुख समस्याएं हैं जिसके कारण युवा रोजगार के लिए पलायन करते हैं।

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    प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई तस्वीर। (जागरण)

    चन्द्र भूषण सिंह, बहादुरगंज (किशनगंज)। बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र पर स्थित बहादुरगंज विधानसभा सीट अंतरराष्ट्रीय सीमा नेपाल से सटा हुआ है। कांग्रेस का गढ़ कहा जाने वाला यह बहादुरगंज विधानसभा क्षेत्र राजनीतिक प्रयोगशाला के रूप में भी देखा जाता है।

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    किशनगंज जिला स्थित यह विधानसभा क्षेत्र पहले बहादुरगंज व दिघलबैंक प्रखंड सहित बहादुरगंज नगर पंचायत में आता था।

    वहीं, परिसीमन के उपरांत इस विधानसभा क्षेत्र में बहादुरगंज प्रखंड का 20 पंचायत, टेढ़ागाछ प्रखंड के सभी 12 पंचायत, दिघलबैंक प्रखंड के तीन पंचायत सहित बहादुरगंज नपं के 18 वार्ड क्षेत्र को शामिल किया गया।

    अब तक 16 बार हुए विधानसभा चुनाव में 10 बार कांग्रेस ने बाजी मारी है। लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में एक नया तूफान उठा, जिसमें कांग्रेस के गढ़ में ओवैसी के पंतग ने लंबी उड़ान भर कामयाबी हासिल की।

    वर्ष 2005 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में विधायक बने तौसीफ आलम क्षेत्र को कांग्रेस का मजबूत गढ़ बनाते हुए कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए थे। वहीं, 2020 में एआईएमआईएम से अंजार नईमी जीत कर राजद में शामिल हो गए।

    यह ध्यान देने वाली बात है कि बहादुरगंज से राजद का लालटेन अब तक चुनाव में कभी नहीं सुलग पाया है। पिछले विधानसभा चुनाव में अंजार नईमी एआईएमआईएम को 85855 मत मिले, लखन लाल पंडित वीआईपी को 40640 मत एवं विधायक रहे कांग्रेस के तौसीफ आलम को 30204 वोट पर ही संतोष करना पड़ा।

    मुस्लिम बाहुल्य विधान सभा क्षेत्र

    बहादुरगंज विधान सभा क्षेत्र में 66 प्रतिशत मुस्लिम वोटर है। जिससे यह सीट बिहार की सबसे मजबूत मुस्लिम-बहुल सीटों में गिना जाता है। मुस्लिम बाहुल्य के बाद हिन्दू वोटरों में गंगई समाज की अधिक मतदाता है।

    भाजपा का परंपरागत वोटर होने के बावजूद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने हमेशा इस समाज के लोगों को उपेक्षित ही रखा। विधानसभा प्रत्याशी बनाना तो दूर संगठनात्मक व एनडीए सरकार द्वारा गठित विभिन्न आयोग में भी तवज्जो नहीं दिया गया।

    फलस्वरूप गंगई समाज शीर्ष नेतृत्व से नाखुश चल रहे हैं। जिसका खामियाजा एनडीए को उठाना पड़ सकता है।

    विकास या वोट बैंक

    बहादुरगंज विधानसभा क्षेत्र के अधिकांश लोग गांव में रहते हैं। खेती ही आजीविका का मुख्य साधन है। लेकिन कोल्ड स्टोरेज, मंडी, प्रोसेसिंग यूनिट सहित अन्य कोई उद्योग धंधा नहीं होने के कारण लोग नाराज हैं। नदी कटाव विधानसभा के पश्चिमी क्षेत्र का मुख्य समस्या है।

    हर चुनाव के समय नेता बहादुरगंज को अनुमंडल, ग्रामीण सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा व रोजगार का जिक्र तो करते हैं। लेकिन इसका हल नहीं निकल पाया। फलस्वरूप रोजगार की तलाश में यहां के युवक दिल्ली, पंजाब, गुजरात, हिमाचल, महाराष्ट्र व जम्मू-कश्मीर पलायन करने पर मजबूर हैं।

    विधानसभा 2025 के लिए फिर से मोर्चा तैयार

    पिछला विधानसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस को छोड़ तौसीफ आलम इस बार एआईएमआईएम से लड़ने की तैयारी में हैं। जबकि पिछली बार एआईएमआईएम से जीते अंजार नईमी पार्टी छोड़कर राजद में शामिल होकर महागठबंधन के प्रत्याशी के रूप में देखे जा रहे हैं।

    वहीं जनसुराज से प्रो. मुसब्बिर आलम के चुनाव लड़ने की संभावना बन रही है। वहीं, एनडीए ने अब तक अपना पत्ता नहीं खोला है। लेकिन भाजपा इस बार एआईएमआईएम व महागठबंधन के संघर्ष बीच पतली गली से विजयी पताका फहराकर एक बार फिर इतिहास रचना चाह रही है।