पहले मां की विदाई, फिर आराधना की तैयारी, किशनगंज के इस गांव में विसर्जन के अगले दिन क्यों होती है कलश स्थापना
किशनगंज के कुटकोडांगी गांव में दुर्गा पूजा की अनोखी परंपरा है, जहाँ प्रतिमा विसर्जन के अगले दिन कलश स्थापना कर पूजा शुरू होती है।

कुटकोडांगी गांव स्थित मां दुर्गा का मंदिर
HighLights
विसर्जन के अगले दिन कलश स्थापना, अनोखी परंपरा।
राजवंशी और आदिवासी समुदाय मिलकर करते हैं पूजा।
सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक।
संवाद सूत्र, गलगलिया (किशनगंज)। आमतौर पर पूरे देश और प्रदेश में शारदीय नवरात्र के दौरान प्रथम पूजा को कलश स्थापना के साथ मां शक्ति की आराधना शुरू होती है और विजयादशमी के आसपास प्रतिमा विसर्जन के साथ पूजा संपन्न हो जाती है।
लेकिन किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड अंतर्गत साखूआडाली पंचायत के कुटकोडांगी गांव में यह धार्मिक परंपरा बिल्कुल उलट है। यहां विजयादशमी के दिन प्रतिमा विसर्जन के ठीक अगले दिन कलश स्थापना कर मां दुर्गा की मुख्य पूजा-अर्चना शुरू की जाती है।
किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड स्थित साखूआडाली पंचायत के कुटकोडांगी गांव में निभाई जाती है सबसे अलग और अनूठी दुर्गा पूजा
सामान्य परंपराओं से इतर, यहां प्रतिमा विसर्जन (21 अक्टूबर) के अगले दिन (22 अक्टूबर) कलश स्थापना कर मां की आराधना होती है शुरू
वर्षों पुरानी इस अनूठी परंपरा में राजवंशी और आदिवासी समुदाय के लोग एक साथ मिलकर भक्तिभाव और पूर्ण विधि-विधान से करते हैं पूजा
धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ यह आयोजन गांव की सामाजिक एकजुटता, सांस्कृतिक विरासत और आपसी सद्भाव को प्रदान करता है मजबूती
वर्षों से चली आ रही यह अनोखी परंपरा न केवल इस गांव को पूरे क्षेत्र में एक विशिष्ट धार्मिक पहचान दिलाती है, बल्कि सामाजिक एकजुटता और समरसता की एक बेजोड़ मिसाल भी पेश करती है।
इस वर्ष कुटकोडांगी गांव में 21 अक्टूबर को शारदीय दुर्गा पूजा की प्रतिमाओं का पारंपरिक विसर्जन किया जाएगा। इसके ठीक अगले दिन यानी 22 अक्टूबर को कलश स्थापना के साथ नौ दिनों तक चलने वाला मां का आराधना चक्र शुरू होगा।
विसर्जन के बाद स्थापित होती है नई प्रतिमा; पुरोहित के नेतृत्व में जुटते हैं ग्रामीण
मंदिर के पुरोहित सुखलाल सिंह बताते हैं कि कुटकोडांगी में प्रतिमा विसर्जन के अगले दिन कलश स्थापना कर मां दुर्गा की पूजा करने की यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
इस दिन नई प्रतिमा स्थापित कर संपूर्ण विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा-अर्चना की शुरुआत होती है। उनके नेतृत्व में होने वाले इस पावन धार्मिक अनुष्ठान में राजवंशी समुदाय के साथ-साथ स्थानीय आदिवासी समाज के लोग भी अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा के साथ भाग लेते हैं।
पूजा की प्रारंभिक तैयारियों से लेकर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के समापन तक हर ग्रामीण की सामूहिक भागीदारी बनी रहती है।
राजवंशी और आदिवासी समाज की साझा आस्था; आपसी भाईचारे का अनूठा केंद्र
कुटकोडांगी गांव की इस दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी खासियत दोनों प्रमुख समाजों की समान सहभागिता है। स्थानीय आदिवासी समाज के प्रतिनिधि पांडु हेम्ब्रम के अनुसार, राजवंशी और आदिवासी समुदाय के लोग कंधे से कंधा मिलाकर मां दुर्गा की आराधना करते हैं।
स्थानीय पूर्व मुखिया मोहनलाल सिंह भी गांव की इस ऐतिहासिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। ग्रामीणों के लिए यह आयोजन महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आपसी मेलजोल बढ़ाने, सामाजिक समरसता को प्रगाढ़ करने और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भावी पीढ़ी के लिए सहेजने का एक स्वर्णिम अवसर है।
