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    Katihar News : गंगा में कटाव के कारण हुए विस्थापितों को पुनर्वास की आस, इंतजार में बीत गए दो दशक

    कटिहार में विस्थापित परिवारों के बच्चे अब बड़े हो गए हैं। वह सड़क किनारे बनी चहारदीवारी और तटबंध को ही अपना घर-आंगन मान चुके हैं। वहीं विस्थापन के वक्त जवान रहे शख्स अब बूढ़े हो चले हैं। उनकी आंखों को अब भी पुनर्वास का इंतजार है।

    By Rajeev ChoudharyEdited By: Yogesh SahuUpdated: Sun, 08 Jan 2023 05:51 PM (IST)
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    गंगा में कटाव के कारण हुए विस्थापितों को पुनर्वास की आस, इंतजार में बीत गए दो दशक

    भूपेंद्र सिंह, बरारी( कटिहार)। गंगा नदी के कटाव से विस्थापित परिवारों का पुनर्वास अब तक नहीं हो पाया है। बसोबास की जमीन मुहैया करा कुछ परिवारों को पुनर्वासित जरूर किया गया है, लेकिन यह महज खानापूर्ति भर साबित हुई है। पुनर्वास की आस में इन विस्थापित परिवारों की पूस की कई माह की सर्द रातें कट चुकी हैं। इनके बच्चे अब सड़क किनारे व तटबंध को ही अपना घर आंगन मान चुके हैं।

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    विस्थापित होने के समय के दुधमुंहे बच्चे अब जवान हो चुके हैं। सरकार द्वारा अब तक इन्हें पुनर्वासित नहीं किया जा सका है। गंगा के कटाव से विस्थापन का दर्द इन्हें अब भी साल रहा है। बताते चलें कि बरारी में बाढ़ कटाव की विभीषिका 1984 में शुरू हुई। जिसमें गंगा नदी की चपेट में आने से मोहनाचांपुर के भवानीपुर कांतनगर, काढ़ागोला व जरलाही पंचायत का अधिकांश हिस्सा नदी के गर्भ में समा गया था।

    इनमें से कई परिवारों को सीजटोला सहित अन्य जगहों पर बसाने का काम भी किया गया था। फिर से 1998 में गंगा के भीषण कटाव से इन बसोबास वाले गांवों के साथ-साथ करीब एक दर्जन नए गांवों को भी विस्थापन का दंश झेलना पड़ा। जिसमें भवनाथनगर, सीजटोला सहित गुरमेला, जौनिया, पकहड़ा, हासिमपुर, भंडारतल, काढ़ागोलाघाट, कांतनगर, बकिया, भवानीपुर कुंडी आदि शामिल हैं।

    हाल के चार वर्षों में बिंद टोली रानीचक बकिया का भी अस्तित्व समाप्त हो गया है। वहीं काढ़गोला घाट से फुलवड़िया गंगा दार्जिलिंग मुख्य सड़क, डूमर, गुरमेला से लेकर मोहना चांपुर के आजमपुर शंकर बांध, सोती रेलवे ढाला, मोहनाडीह आदि जगहों पर शरण लेकर विस्थापित परिवार यायावर की जिंदगी जी रहे हैं।

    इसमें से कुछ महादलित परिवार को हाल के वर्षों में तीन-तीन डिसमिल जमीन देकर बसाने की औपचारिकता भी पूरी की गई। बसोबास की जमीन को भी गड्ढे में बताकर अधिकांश परिवार अब भी अपना ठिकाना सड़क व तटबंध को ही बनाए हुए हैं। विस्थापन का दंश झेल रहे बलराम महतो, छंगुरी देवी, सत्तो मंडल, राजेश चौधरी, संजय हांसदा आदि के जन्मे बच्चे अब बालिग हो गए हैं।

    वहीं रामचुलहाई महतो फेकन ऋषि तटबंध पर करीब दो दशक गुजार कर 75 की उम्र को पार कर बूढ़े हो चले हैं। पुनर्वास की मांग को लेकर कई बार धरना प्रदर्शन किया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो पाई है।

    क्या कहते हैं अधिकारी

    अंचल पदाधिकारी ललन मंडल ने बताया कि पिछले डेढ़ दशक में विस्थापित परिवार को पुनर्वासित करने का काम किया गया है। भूमिहीन महादलित परिवार को तीन-तीन डिसमिल जमीन देकर बसाने का काम किया गया है। इसमें से अधिकांश लोग जमीन भी क्रय कर चुके हैं। शेष बचे परिवारों को भी बासगीत पर्चा व जमीन क्रय कर पुनर्वासित करने का प्रस्ताव भेजा गया है।