बिहार में देसी मछलियों का संकट: मखाना की खेती और कीटनाशक बन रहे विलुप्ति का कारण
Bihar Desi Fish Crisis: कोसी-सीमांचल क्षेत्र में देसी मछलियों का अस्तित्व संकट में है, जिसका मुख्य कारण मखाना की अनियंत्रित ...और पढ़ें

Bihar Desi Fish Crisis: कटिहार की नदियों और जलाशयों में मखाना की खेती के बीच पारंपरिक देसी मछलियां
HighLights
मखाना खेती, कीटनाशक देसी मछलियों के विलुप्ति का कारण।
टेंगरा, पोपता जैसी कई प्रजातियां अब नहीं मिलतीं।
मछुआरों की रोजी-रोटी छिनी, आंध्र-बंगाल पर निर्भरता बढ़ी।
संवाद सूत्र, रोशना (कटिहार)। Bihar Desi Fish Crisis: स्वाद और सेहत के लिए विख्यात कोसी-सीमांचल की प्राकृतिक देसी मछलियों के अस्तित्व पर गंभीर संकट गहरा गया है। कटिहार जिले के प्राणपुर प्रखंड क्षेत्र सहित आसपास की नदियों, ढाबों और प्राकृतिक जलाशयों से पौष्टिकता से भरपूर देसी मछलियां तेजी से गायब हो रही हैं।
नदियों और जलाशयों में मखाना की अनियंत्रित खेती, अंधाधुंध कीटनाशकों व तेज रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते प्रयोग के कारण कई दुर्लभ देसी प्रजातियां या तो विलुप्त हो चुकी हैं या उनकी तादाद नगण्य रह गई है। इस पर्यावरणीय संकट के कारण पारंपरिक रूप से मछली पकड़ने और बेचने के धंधे से जुड़े परिवारों की रोजी-रोटी छिन गई है और वे दूसरे पेशों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।
अंधाधुंध कीटनाशकों और रासायनिक खादों से जलीय तंत्र तबाह
आयुर्वेद से लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तक जिन छोटी देसी मछलियों को प्रोटीन, विटामिन और आंखों की रोशनी के लिए अमृत समान मानते हैं, वही मछलियां आज जलस्रोतों से पूरी तरह साफ हो चुकी हैं। जानकारों के अनुसार, प्राकृतिक जलधाराओं में बड़े पैमाने पर मखाना की फसल उगाने के लिए खरपतवार नाशक और कीट नाशक रसायनों का भारी छिड़काव किया जा रहा है।
संकट में देसी जलीय जीवन: प्रमुख बिंदु
विलुप्त हो रहीं प्रमुख देसी प्रजातियां: टेंगरा, पोपता, बचुआ, झींगा, मांगुर, सिंघी, बुआरी और देसी रोहू।
- बाजार पर असर: स्थानीय प्राकृतिक मछलियों का अभाव; आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड की चालानी मछलियों पर बढ़ी निर्भरता।
इस जहरीले पानी ने छोटी मछलियों की प्राकृतिक नर्सरी को नष्ट कर दिया है। इसके अलावा अधिक मुनाफे के चक्कर में तालाबों और पोखरों में तेजी से बढ़ने वाली हाइब्रिड मछलियों का जीरा डाला जा रहा है, जिससे पारंपरिक देसी प्रजातियों का संवर्धन पूरी तरह रुक गया है।
टेंगरा, पोपता और बचुआ जैसी प्रजातियां हुईं नदारद
इलाके के बुजुर्गों और मछली व्यवसायियों का कहना है कि पहले स्थानीय जलधाराओं में प्रचुर मात्रा में मिलने वाली टेंगरा, पोपता, बचुआ, झींगा, मांगुर, सिंघी और देसी रोहू जैसी मछलियां अब ढूंढने से भी नहीं मिलतीं। यदि कभी ग्रामीण हाट-बाजारों में ये मछलियां थोड़ी मात्रा में आ भी जाती हैं, तो उनके दाम आसमान छूने लगते हैं और वे आम उपभोक्ताओं की पहुंच से बाहर हो जाती हैं। यही वजह है कि स्थानीय मांसाहारी आबादी अब पोखरों की सामान्य मछलियों या फिर आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड से ट्रकों में बर्फ लगाकर मंगाई जाने वाली चालानी मछलियों पर निर्भर रहने को विवश है।
अंडों का अवैध दोहन और पानी में जहर डालकर शिकार
देसी मछलियों की नस्ल खत्म होने के पीछे मानवजनित क्रूर तरीके भी जिम्मेदार हैं। जानकारों का कहना है कि बरसात के दिनों में जब बाढ़ के पानी और नदी की तेज धार में मछलियां प्रजनन कर अंडे देती हैं, तो उस दौरान कुछ असामाजिक तत्व बारीक प्लास्टिक जाल (मच्छरदानी जाल) लगाकर उन अंडों और छोटे जीरों को समेट लेते हैं।
इसके अतिरिक्त सबसे खतरनाक चलन पानी में जहर डालकर मछलियों को मारने का शुरू हुआ है। पानी में रासायनिक जहर घोलने से बड़ी मछलियों के साथ-साथ करोड़ों सूक्ष्म जीव, पौधे और छोटी मछलियां एक साथ दम तोड़ देती हैं।
वहीं नदियों में चट्टी जाल व महाजाल लगाकर जीरा मछलियों को भी बाजार में खपा दिया जाता है, जिससे उनकी अगली पीढ़ी पैदा ही नहीं हो पाती। समय रहते इस पर कानूनी रोक नहीं लगी तो आने वाले दिनों में कोसी-सीमांचल की पहचान बन चुकीं ये मछलियां सिर्फ किताबों में ही सिमट कर रह जाएंगी।
