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    जान हथेली पर लेकर स्कूल जाने मजबूर बच्चे, खस्ताहाल स्कूली वाहनों के हाल

    Updated: Fri, 29 Aug 2025 03:52 PM (IST)

    कैमूर जिले में निजी स्कूलों के वाहनों की हालत खस्ता है जिससे बच्चों की सुरक्षा खतरे में है। अधिकतर मैजिक वैन में एक ही चालक होता है जो बच्चों को लाने-ले जाने की जिम्मेदारी निभाता है। बच्चे खिड़कियों से बाहर झांकते रहते हैं जिससे दुर्घटना का डर बना रहता है। स्कूल प्रबंधन केवल फीस वसूलता है सुरक्षा पर ध्यान नहीं देता।

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    स्कूली वाहनों में बच्चों की जान को हमेशा खतरा

    जागरण संवाददाता, भभुआ। जिले में निजी स्कूलों की संख्या दो सौ से अधिक है। सभी स्कूलों में नामांकित बच्चों की संख्या भी औसतन पांच सौ के आसपास है। कुछ स्कूलों में बच्चों की संख्या एक हजार से भी अधिक है। नामांकित बच्चों में अधिसंख्य बच्चे स्कूली वाहन से ही आते-जाते हैं। लेकिन स्कूली वाहनों की स्थिति इतनी खराब है कि उसमें आने-जाने वाले बच्चों की जान को हमेशा खतरा है ।

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    जिले के निजी स्कूलों में सबसे अधिक मैजिक व वैन ही हैं। जिस पर बच्चों को स्कूल लाने व स्कूल से घर छोड़ने की जिम्मेदारी मात्र एक चालक पर है। चालक स्टेयरिंग संभालने के अलावे और कुछ नहीं देख पाता। ऐसे में बच्चे वाहन की खुली खिड़कियों से बाहर हाथ निकालते हैं तो कभी सिर निकाल कर बाजार का हाल देखते हैं।

    कुछ मैजिक के पीछे वाले हिस्से में लगे पर्दा भी फट गए हैं, लेकिन उन्हें बदला नहीं जा रहा है। उस खाली जगह से भी बच्चे बाहर तांक-झांक करते हैं और हाथ निकालते हैं। बाजार में आने-जाने के दौरान साइड लेने के दौरान यदि किसी वाहन में बच्चे का सिर या हाथ टकराया तो कोई बच्चा गंभीर रूप से घायल हो सकता है।

    लेकिन सबसे गंभीर बात यह है कि जो स्कूली वाहन हैं वे प्रतिदिन डायरेक्टर, प्रिंसिपल, प्रबंधन के अन्य जिम्मेदारी व्यक्ति की नजरों के सामने से ही आते-जाते हैं। स्कूल परिसर में जब बच्चे पहुंचते हैं और जब स्कूल परिसर में वाहन पर बैठते हैं तो प्रबंधन का कोई व्यक्ति जरूर रहता है, इसके बाद भी उसमें सुधार के लिए कुछ नहीं किया जाता।

    कहीं नहीं है स्टैंड, जहां-तहां रूकते हैं स्कूली वाहन

    जिले में संचालित निजी स्कूलों के वाहनों का कोई निश्चित स्टैंड नहीं है। बच्चे जहां या जिस क्षेत्र में रहते हैं वहां मुख्य सड़क पर वाहन रोक कर उन्हें उतारा या बैठाया जाता है। ऐसे में बच्चे सड़क पर ही उतरते हैं।

    कई जगहों पर तो बच्चे सड़क पर उतर कर फिर सड़क को पार भी करते हैं और तब घर जाते हैं। इस दौरान कुछ बच्चों के तो अभिभावक भी साथ नहीं होते। इसमें कुछ छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं। हालांकि साथ में बस से उतरने वाले बच्चे उन छोटे बच्चों का हाथ पकड़ कर सड़क पार करा देते हैं। लेकिन इन सब बिंदुओं पर गौर किया जाए तो यह स्पष्ट है कि स्कूल प्रबंधन सिर्फ परिवहन शुल्क वसूलना जानता है, बच्चों की सुरक्षा या उनकी देखरेख को लेकर प्रबंधन को कोई मतलब नहीं।

    एक से 31 जुलाई 2025 तक चलाए गए विशेष जांच अभियान में 50 से अधिक स्कूली वाहनों की जांच की गई है। जांच के क्रम में एक दर्जन से अधिक वाहनों को अनफिट पाया गया। जिनके विरुद्ध कार्रवाई करते हुए अर्थदंड वसूला गया है। समय-समय पर विभाग के दिशा निर्देश के तहत स्कूली वाहनों की जांच की जाती है। जुलाई माह में 51 स्कूलों के वाहनों को परमिट दिया गया है।- प्रभात रंजन, एमवीआइ भभुआ

    कहते हैं अभिभावक

    मनोज कुमार पटेल ने कहा स्कूली वाहनों में बच्चों की सुरक्षा व देखरेख को लेकर लापरवाही बरती जा रही है। बच्चे सड़क पर उतरते हैं और सड़क को पार करते हैं। इससे हमेशा खतरे की आशंका रहती है। सड़क पर कोई दुर्घटना न हो इसके लिए अभिभावक अपने बच्चों को लेने के लिए सड़क पर खड़ा होकर स्कूली वाहन के आने का इंतजार करते हैं। यदि वाहन में कोई व्यक्ति देखरेख करने वाला हो तो अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता नहीं रहेगी।

    रवि कुमार ने कहा स्कूली वाहनों में बच्चे पूरी तरह असुरक्षित हैं। स्कूली वाहनों की खुली खिड़कियों से बच्चें बाहर ताक-झांक करते हैं। हाथ बाहर निकाल लेते हैं। कभी-कभी तो खिड़की पर बच्चों को बैठते हुए देखा जाता है। स्कूली वाहन का चालक स्टेयरिंग संभाले की बच्चों को देखे। ऐसे में हमेशा दुर्घटना होने का डर रहता है। यह स्थिति छोटे वाहनों में अधिक है। स्कूली बसों में तो एक व्यक्ति को बच्चों को सड़क पार कराते देखता हूं।