गया । श्राद्ध शब्द श्रद्धा का परिचालक है। श्रद्धा से किए गए कार्य को श्राद्ध कहते हैं। प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष में गया में आकर लाखों श्रद्धालु अपने पितरों की मुक्ति की कामना को लेकर श्राद्धकर्म करते हैं। शुक्रवार को वैतरणी सरोवर के पवित्र जल से हजारों पिंडदानियों ने कर्मकांड, तर्पण एवं गौ-दान किया। शनिवार को अक्षयवट में पिंडदान एवं सुफल प्राप्त करेंगे।

वैतरणी सरोवर पर गौ-दान एवं तर्पण को लेकर पिंडदानी सुबह से पहुंचने लगे थे। देखते-देखते पूरा सरोवर परिसर पिंडदानियों से पट गया। जिला प्रशासन द्वारा सरोवर के घाट पर कर्मकांड को लेकर पंडाल का निर्माण किया गया है। पंडाल में बैठ करपिंडदानी वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ कर्मकांड कर रहे थे। कर्मकांड की विधि गयापाल पुरोहित द्वारा संपन्न कराया जा रहा था। पिंडदानी सरोवर के पवित्र जल एवं दूध से तर्पण कर रहे थे। घाट पर ही गौ-दान भी किया जा रहा था। उत्तर प्रदेश के लखनऊ से आए प्रमोद अवस्थी ने कहा कि गयाजी पहली बार आए हैं। गौ-दान कर मन की शांति मिल रही है। पितरों को स्वर्गलोक में पहुंचने के लिए गौ-दान की विधि काफी महत्व रखता है। गौ-दान कर ऐसा महसूस हो रहा है कि पितृ स्वर्गलोक पहुंच गए। मान्यता है कि गौ-दान करने से पूर्वजों को वैतरणी नदी को पार करने में परेशानी नहीं होती। नदी को पार कर पूर्वज आसानी से विष्णुलोक पहुंच जाते हैं।

Posted By: Jagran

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