ज्ञान का उदय होना योग का चरम लक्ष्य
गया। महर्षि पतंजलि योग-दर्शन के प्रणेता थे। उन्होंने योग के सिद्धांतों का वर्णन 'योग-सूत्र' में क
गया। महर्षि पतंजलि योग-दर्शन के प्रणेता थे। उन्होंने योग के सिद्धांतों का वर्णन 'योग-सूत्र' में किया था। 'योग-सूत्र' योग-दर्शन का प्रथम ग्रंथ है। आचार्य व्यासदेव ने 'योग-सूत्र' पर 'व्यासभाष्य' लिखा। बाद में आचार्य वाचस्पति ने 'तत्ववैशारदी' तथा विज्ञानभिक्षु ने 'योगवार्तिका' नामक टीका लिखी है। योग के सिद्धांतों का प्रामाणिक वर्णन इन्हीं तीन ग्रंथों में मिलता है।
योग का अर्थ मिलन
योग शब्द का प्रचलित अर्थ 'मिलन' है। अर्थात आत्मा का परमात्मा से मिलन। महर्षि पतंजलि ने योग को चित्तवृतिनिरोध कहा है। योग में मन, बुद्धि और अहंकार को चित्त कहा गया है। जब चित्त इन्द्रियों के द्वारा विषयों के संपर्क में आता है। तो वह उसका आकार ले लेता है। इस आकार को ही वृति कहते हैं। चित्तवृत्ति के प्रभाव से आत्मा या पुरुष का यथार्थ स्वरूप छिप जाता है। और आत्मा बंधनग्रस्त हो जाती है।
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अभ्यास
बंधन से मुक्ति के लिए विवेक ज्ञान चाहिए। विवेक ज्ञान की प्राप्ति योग के अभ्यासों से ही संभव है। योगाभ्यास से आत्मा के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। और वह मुक्त हो जाती है। योग दर्शन में योगाभ्यास की व्याख्या मोक्ष को अपनाने के उद्देश्य से ही किया गया है।
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साधन
महर्षि पतंजलि ने चित्तवृतिनिरोध के लिए 'योग-सूत्र' में आठ प्रकार के साधन बताये हैं। वे हैं - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। यम: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्माचर्य और अपरिग्रह को यम कहते हैं। चित्त की शुद्धता के लिए यम का पालन करना जरूरी है।
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नियम
नियम का संबंध आचरण से है। अच्छे आचरण से ही जीवन में संयम आता है। समाधि तक पहुंचने के लिए संयमी जीवन जरूरी है। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर। प्रणिधान के ये पाच नियम हैं। शारीरिक शुद्धि को शौच, अपने कोशिश से जो प्राप्त हो संतोष, कठिन व्रत करना तप, नियमपूर्वक धर्मग्रंथों का अध्ययन करना स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाने को ईश्वर।
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आसन
शरीर का सुखपूर्वक एक मुद्रा में स्थिर रहना आसन कहलाता है। आसनों से मन में एकाग्रता आती है। आसन को दृढ़, सुखदायक और सरल होना चाहिए। जितने प्रकार की जीव व जातिया हैं। उतने ही प्रकार के आसन होते हैं। इसके अभ्यास से शरीर स्वस्थ्य रहता है। वे तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ्य रखते हैं। शरीर पर नियंत्रण योग का आधार है। आसन का अभ्यास गुरु के निर्देशन में करना चाहिए।
प्राणायाम
सांस लेने और छोड़ने की स्वाभाविक गति को नियंत्रण में करना प्राणायाम कहलाता है। प्राणायाम तीन तरीकों से की जाती है - पूरक, कुंभक और रेचक। पूरक में गहरी सांस ली जाती है। कुंभक में फेफड़े में भरी हुई वायु को कुछ समय के लिए रोक लिया जाता है और रेचक में उस वायु को धीरे धीरे बाहर निकाला जाता है।
प्रत्याहार
इन्द्रियों को अपने मन के वश में करना प्रत्याहार है। यह तभी हो सकता है जब हम अपने इन्द्रियों को वाह्य वस्तुओं से अलग कर दें। इस अवस्था में इन्द्रिया सांसारिक विषयों से निर्लिप्त हो जाती हैं। यह अभ्यास कठिन है। पर असंभव नहीं। इसे कठिन योगाभ्यास से प्राप्त किया जा सकता है।
धारणा
धारणा का अर्थ चित्त को किसी एक विशेष स्थान पर स्थिर करना है। वह स्थान शरीर के अंदर या बाहर हो सकता है। चित्त को शरीर के किसी अंग जैसे हृदय, भौहों का मध्य भाग, कंठ इत्यादि या किसी देवता की प्रतिमा इत्यादि वाह्य वस्तु पर केन्द्रित किया जाता है। चित्त को किसी विषय पर एकाग्र करने से उसमें ध्यान की क्षमता आ जाती है।
ध्यान
ध्येय के विषय पर लगातार मनन और चिंतन करना ध्यान कहलाता है। ध्यान के प्रवाह में जो विचार धारा उत्पन्न होती है। उससे विषय का स्पष्ट ज्ञान हो जाता है। पहले विषयों के अंशों का ज्ञान होता है। फिर ध्यान की शक्ति बढ़ने पर संपूर्णता का ज्ञान होता है। ध्यान की अवस्था में आत्मा या पुरूष को मुक्ति का आभास होने लगता है।
समाधि
यह योग का अंतिम साधन है। समाधि में चित्त की एकाग्रता ध्येय विषय पर हो जाता है। इस अवस्था में ध्यान, ध्येय विषय का आकार ले लेता है। दोनों के मिल जाने से मन ध्येय विषय में पूर्णत: लीन हो जाता है। ज्ञाता और ज्ञेय दोनों का द्वैत समाप्त हो जाता है। विवेक ज्ञान का उदय हो जाता है। यही योग का चरम लक्ष्य है।
प्रो. अरूण कुमार प्रसाद, उपप्राचार्य, मिर्जा गालिब कालेज, गया
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