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    सेवाभाव मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म

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    Updated: Fri, 09 Sep 2016 12:51 AM (IST)

    सेवा भाव एक ऐसा भाव है जो मनुष्य को देवत्व का स्थान दिला देता है। मनुष्य से देवता बन जाना आसान नहीं है लेकिन इस भाव को क्रियान्वित करना सहज भी नहीं है। चूंकि यही वह भाव है जो मनुष्य को अति विनम्रता की सीढ़ी से गुजरने को कहता है। उस सीढ़ी के पायदान पर पैर सभी नहीं रख पाते। ऐसा नहीं है कि उस पायदान पर पांव रखने के लिए उसे ज्ञान की कमी है।

    दरभंगा । सेवा भाव एक ऐसा भाव है जो मनुष्य को देवत्व का स्थान दिला देता है। मनुष्य से देवता बन जाना आसान नहीं है लेकिन इस भाव को क्रियान्वित करना सहज भी नहीं है। चूंकि यही वह भाव है जो मनुष्य को अति विनम्रता की सीढ़ी से गुजरने को कहता है। उस सीढ़ी के पायदान पर पैर सभी नहीं रख पाते। ऐसा नहीं है कि उस पायदान पर पांव रखने के लिए उसे ज्ञान की कमी है। ¨कतु उसकी सोच उस स्थिति में संकुचित पड़ जाती है। मन का दर्प उसे घेर लेता है। अहं की भावना उसे जकड़ लेती है। छोटे बड़े का सवाल खड़ा हो जाता है। ऊंच-नीच की भावना जागृत होने लगती है। कथनी करनी में नहीं बदल पाती। जैसे राह चलते किसी आदमी को कोई मिल जाता है और उसे उस आदमी से सेवा की उपेक्षा रहती है। परंतु वह आदमी जान बूझकर उसकी उपेक्षा करता है जबकि उसे पता होता है कि सेवा भाव बड़ा धर्म है। एक शिक्षक गांधी जी की सेवा भाव को जानता भी है वर्ग में छात्रों को पढ़ाता भी है ¨कतु वह उस कार्य को करने के लिए तत्पर नहीं दिखता। मदर टेरेसा जैसे व्यक्तित्व पर व्याख्यान देने के लिए कहा जाय तो कोई अपनी विद्वता के बल पर ढेर सारी बात उगल सकता है। ¨कतु पर उपदेश कुशल बहुतेरे सेवा औरों की ही नहीं होती है। अपनों एवं स्वयं की भी होती है। जिसका ज्ञान अपेक्षित होना स्वभावत: होता है। यह जानकर कि हमने जीवन को क्या दिया। मनुष्य कदम कदम पर औरों की सेवा कर सकता है। बशर्ते कि उसमें सेवा भाव की जड़ जमी हो। जैसे कि मैं गाड़ी से गुजर रहा हूं और किसी ने हाथ का इशारा कर कुछ दूर छोडऩे की बात कहीं पर मैं उसे टाल देता हूं। जबकि इतना करना असहज नहीं है। असहजता तभी पैदा होती है। जब हमारी भावना वैसी नहीं होती है। किसी के व्यक्तित्व को तौलने लग जाते हैं। सदभावना को आंक कर धर्म और सम्प्रदाय को देखने लग जाते हैं। मनुष्यता की पहचान न कर पशुता की ओर अग्रसर हो जाते हैं। यदि मनुष्यता की कसौटी पर खड़े होने की प्रवृत्ति जगने लगे तो पशुता धीरे धीरे खत्म हो जाती है। और स्वयं सेवा भाव मजबूत होने लगता है। हर कोई मदर टेरेसा या गांधी नहीं हो सकते तो कम से कम मनुष्य तो हो ही सकता है। देवत्व को प्राप्त नहीं कर सकता तो इंसानियत को प्राप्त कर ही सकता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी ऐसा भी क्षण आता है जब दूसरे की सेवा कर देते हैं। उस घड़ी को भी याद करने की जरूरत होती है। और उसे अपनाने की भी। दूभ पर सभी चलते हैं। दूभ सभी के पांव चूमता है। वह हमेशा विद्यमान रहता है ¨कतु बड़े पेड़ या घास हमेशा नहीं रहते। या तो उन्हें काट दिए जाते हैं या साफ कर दिए जाते हैं। सेवा भाव दूभ की तरह जीने में है। बडे पेड़ की तरह अकडऩे में नहीं। कोई सिर्फ बड़ा हो सकता है। सभी स वा भाव को तरसते हैं। हर तनाव और ¨खचाव की जड़ में सेवा भाव की कमी पाई जाती है। यदि सबों में यह भाव जग जाय तो संसार ही राममय हो जाएगा। लेकिन वैसे व्यक्तित्व को कितने लोग अपना पाते हैं। प्रश्न है। ऐसे व्यक्तित्व आज तक उंगली पर गिनने वाले ही हुए हैं। सेवा भाव की आवश्यकता समग्रता में है एकाग्रता में नहीं।

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    डॉ. रामदेव महतो

    शिक्षक रोज पब्लिक स्कूल

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    सेवा व सहयोग से बनती है पहचान

    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। हमारा समाज एक दूसरे के सहयोग और सेवा पर ही आधारित है। मनुष्य कभी और कहीं बिना सहयोग और सेवा के अपनी पहचान नहीं बना सकता है। अत: मनुष्य को समाज में अपनी प्रतिष्ठा बनाने में कर्तव्य और सेवा भाव अहम भूमिका अदा करता है। मनुष्य को सबों के प्रति हमेशा संभवत: जितना हो सके सेवा की भावना रखनी चाहिए। घर में अपने माता-पिता तथा बड़े बुजुर्गों क प्रति सेवा भाव रखना हमारा परम कर्तव्य होता है। यह हमारे भविष्य को उज्ज्वल तथा सार्थक बनाता है। क्योंकि एक परिवार के प्रति हम जैसा सेवा भाव रखेंगे वैसा ही हमारे बच्चे सीखेंगे और एक विद्यालय में शिक्षक का भी अपने सहकर्मी तथा छात्रों के प्रति हमेशा सेवा की भावना रखनी चाहिए। क्योंकि विद्यालय में एक शिक्षक होने के नाते हम जैसा भाव रखेंगे वैसा ही हमारे छात्र सीखेंगे।

    प्रियंका झा, शिक्षिका,

    रोज पब्लिक स्कूल

    मनुष्य का सृजन परम पिता परमेश्वर द्वारा ह आ है। सभी धर्मों में मानव जाति की सेवा को सर्वोपरि माना गया है। स्वार्थ हीन सेवा भाव जीवन में संतोष का भाव उत्पन्न करता है। मानव मूल्यों की उपयोगिता तो निस्वार्थ सेवा भाव में ही संलिप्त है। यही इसका उत्कर्ष है यही परम धर्म है। सामाजिक तंत्र भी इसी से बंधा है। जीवन का परम लक्ष्य भी यही होना चाहिए। सार्थकता और लक्ष्य मनुष्य के लिए मानवता को परिभाषित करता है।

    रमेश कुमार झा

    प्राचार्य

    रोज पब्लिक स्कूल

    ईश्वर की प्राप्ति का माध्यम है सेवा भाव

    सबों के प्रति समर्पित रहने को सेवा भाव कहा जाता है। यह ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सरल और आसान मार्ग है। हमें देश के प्रति समाज के प्रति हमेशा सेवा का भाव रखना चाहिए। जिससे हम महान बन सकते हैं। वर्तमान समाज किसी कारण वश पश्चात विचार धारा की ओर बढ़ रहा है। जहां सेवा की कल्पना नहीं की जा सकती। वैसे जगहों पर हमें उन युवा पीढियों को सेवा के महत्व की जानकारी दिलाने का प्रयास किया जाय।

    रत्नेश्वर झा

    एक्टिवीटी इंचार्ज

    रोज पब्लिक स्कूल

    सेवा शब्द का अर्थ सेवक बनने से है। अगर दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति अपने को सेवक और दूसरे को स व्य समझे तो अनायास ही सबका कल्याण हो जाएगा। जहां अहंकार की समाप्ति होती है वहां से सेवा आरंभ होती है।

    नमन कुमार, रोज पब्लिक स्कूल

    हमें अपने से बड़ों की सेवा अवश्य करनी चाहिए। इसके माध्यम से आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि हमारी आत्मा अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करती है।

    सानिया रहमान, रोज पब्लिक स्कूल

    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जो एक दूसरे की सेवा पर टीका है। सेवा हमारे जीवन एक महत्वपूर्ण अंग जिसके बल पर हम अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।

    प्राची प्रिया, रोज पब्लिक स्कूल