देश मे पहली बार नीलगाय को बनाया जाएगा पालतू
बक्सर धान के कटोरा के नाम से विख्यात बक्सर जिले में हर साल किसान 142931 हेक्टेयर क्षेत्रफ

बक्सर : धान के कटोरा के नाम से विख्यात बक्सर जिले में हर साल किसान 1,42,931 हेक्टेयर क्षेत्रफल में विभिन्न फसलों की खेती करते हैं। यहां धान की खेती 90 हजार से 1.8 लाख हेक्टेयर में की जाती है। पर, हर साल किसानों के खून पसीना बहाकर उपजाए गए फसल को जिले में काफी संख्या में मौजूद नीलगाय बर्बाद कर देते हैं। बक्सर के अलावा कई अन्य जिलों में भी बड़े पैमाने पर हर साल नीलगायों द्वारा फसल बर्बाद कर दिया जाता है। इसको देखते हुए बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर नीलगायों को पालतू बनाए जाने के विषय पर शोध करने की ठानी है। बक्सर के डुमरांव में नीलगाय शोध संस्थान बनाने के लिए कृषि विश्वविद्यालय ने हरी झंडी दे दी है ओर अगले सप्ताह से ही इस पर काम शुरू हो जाएगा।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर के कुलपति डा. अरूण कुमार ने फोन पर बताया कि शोध केन्द्र आरंभ करने के लिए बिहार कृषि विश्व विद्यालय सबौर द्वारा पूर्णिया स्थित भोला शास्त्री कृषि कालेज में पदस्थापित जीव-जंतु वैज्ञानिक डा. सुदय प्रसाद को जिम्मेवारी सौंपी गई है। नीलगाय को पालतू जानवर बना रोजगार एवं आर्थिकोपार्जन की संभावना को देखते हुए सरकार के कृषि विभाग द्वारा इस शोध केन्द्र के लिए करीब 50 लाख की राशि आवंटित की गई है। नीलगाय पर शोध करने वाला बिहार देश का पहला प्रांत होगा साथ ही सूबे में सबसे पहले बक्सर के डुमरांव में इसकी स्थापना की जा रही है। नीलगाय में पाए जाते है हिरण एवं बकरी के लक्षण
जीव जंतु वैज्ञानिक डा.सुदय प्रसाद ने बताया कि नीलगाय के नाम में गाय शब्द जरूर लगा है पर, यह पशु गाय प्रजाति का नहीं बल्कि हिरण एवं बकरी प्रजाति का है। नीलगाय के बहुत सारे लक्षण हिरण एवं बकरी से मिलते जुलते है। हिरण एवं बकरी में दो थन होते हैं तथा आमतौर पर दो से तीन बच्चों को जन्म देते हैं। इसी प्रकार नीलगाय के भी दो थन होते हैं तथा दो से तीन बच्चे को जन्म देते है। नीलगाय का मल भी हिरण एवं बकरी के समान ही होता है। राज्य का 31 जिला नीलगाय से प्रभावित
डुमरांव में आगामी सप्ताह से खुलने वाले नीलगाय शोध केन्द्र का कमान संभालने वाले जीव जंतु वैज्ञानिक डा.सुदय प्रसाद ने बताया कि राज्य में बक्सर सहित कुल 31 जिला नीलगाय से प्रभावित है। नीलगाय को मार देना समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। नीलगाय को मारने से पर्यावरण असंतुलित होने की प्रबल संभावना है। नीलगाय के दूध में कई जरूरी तत्व मौजूद हैं।
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देश में पहली बार डुमरांव स्थित वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय की जमीन पर नीलगाय को पालतू जानवर बनाए जाने की दिशा में शोध केन्द्र की शुरूआत करने की मंगलवार को स्वीकृति प्रदान कर दी गई है। शोध केन्द्र का अगले सप्ताह से संचालन शुरू हो जाएगा।
डा. अरूण कुमार, कुलपति बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर
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